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ओ गो माँ दुर्गा

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दुर्गा पूजा आई और चली भी गयी...हर बार माँ आती हैं तो एक अलग सा उत्साह रहता है और जब जाती हैं तो एक लम्बी खामोशी...। एक उदासी पसरी रहती है। दुर्गापूजा बंगाल की उमंग को एक नयी उड़ान देती है...एक अलग सी खुशी...माँ के आने की खुशी। माँ बेटी भी तो है...साल में चार दिन के लिए ही तो आती हैं..भक्ति और भावना एक तरफ...मगर फिर एक जिज्ञासा जाग पड़ी...365 दिन में सिर्फ 4 दिन ही क्यों...और कुछ दिन ही क्यों...क्या कैलाश पर्वत वाली दुर्गा भी इस धरती की दुर्गा की तरह ही है। लाचार तो कह नहीं सकती मगर दायित्व का बड़ा भार तो है ही..महिषासुर को मारने वाली दुर्गा, जिनके दस हाथ हों...जिन पर समूचा देवलोक निर्भर हो...वह भला लाचार कैसे हो सकती हैं...मगर ऐसा लगता है कि वह दुर्गा भी अपना ख्याल नहीं रखतीं वरना अपने मायके आने के लिए लड़कियाँ कहाँ इतना इन्तजार कर पाती हैं...इन्तजार कर भी लें तो कहाँ मिलती है फुरसत...इजाजत...हर बार तो मन में कसक लिए ही विदा होती हैं...माँ दुर्गा के मन में भी तो ऐसी ही कसक होगी...मन बावरा है न....कुछ भी सोचने लगता है..। सब कहेंगे...माँ तो देवी हैं...उनकी तुलना हम जैसे मनुष्यों से