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बात तो उठेगी..क्योंकि बोलना जरूरी है

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जब भी कोई महिला उत्पीड़न की बात होती है तो घर की शांति के नाम पर चुप्पी, मौन और खामोशी जैसे शब्द साथ लिए जाते हैं। मुखर स्त्रियाँ कभी भी पसन्द नहीं की गयीं। अपनी मर्यादा और आत्म सम्मान को दाँव पर लगाकर जिन्दगी गुजार देने वाली और एक दिन मर जाने वाली स्त्रियों का गुणगान बहुत होता है। यदि कोई स्त्री बोलती है तो उसे पहले ही दरकिनार कर दिया जाता है और कई बार स्त्री के विरोध और विद्रोह को दबाकर ऐसी कहानी बना दी जाती है कि उस स्त्री का विद्रोह दिखता ही नहीं है। आजकल एक मुहिम सी चल पड़ी है उत्पीड़न को दबाने की और इस माइंड वॉश में कवि और लेखक खुलकर सामने आ रहे हैं। कुमार विश्वास और मनोज मुन्तशिर, दो ऐसे दिग्गज नाम हैं जो इस मामले में खुलकर अपनी लोकप्रियता का इस्तेमाल भी कर रहे हैं। यही समाज है कि जिसने मुखर द्रोपदी को देवी तो कहा मगर हाशिए पर रखा। सीता के मौन आर्तनाद को श्रीराम के गुणगान से ढक दिया गया। अच्छा है जहाँ आपके प्रभु का गुणगान हो, वह भाग सत्य है और जहाँ उन पर निष्पक्षता से बात की जाए, वह आपको जोड़ा हुआ लगता है। आप सीता वनवास के स्थलों, ऋषि वाल्मिकी के आश्रम, लव - कुश के जन्मस्थल, ऐस

वह उपेक्षित, प्रताड़ित स्त्री....मेरी माँ है

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मन....मनोविज्ञान...मानसिक स्वास्थ्य और स्त्री का मन...हलचल मचा रहे हैं मन में। मन को कौन समझ पाया है भला...और स्त्री के मन को समझने की कोशिश भी कौन करता है। स्त्री माने मातृशक्ति.....स्त्रीत्व अपने आप में एक पूरा शब्द है और मातृत्व इसका एक रूप मगर इस एक रूप ने स्त्री के समूचे अस्तित्व को ढक दिया है। स्त्री माँ है मगर सिर्फ माँ ही नहीं है..जाहिर है कि जब समाज उस पर यह दायित्व थोपता है तो उसके मन में ममता की जगह द्वेष लेने लगता है। आज मैं स्त्री के मन को समझने की कोशिश कर रही हूँ। कोई भी चीज पूरी तरह श्वेत या पूरी तरह श्याम नहीं हो सकती, वह धूसर भी हो सकती है। हमारे समाज में पितृसत्तात्मक सोच ने स्त्री को इतना असुरक्षित किया...कि वह अपनी करुणा, अपनी ममता...अपना स्त्रीत्व सब खो बैठी...जब उस पर किसी और के दायित्व थोपे गये तो उसके मन में जो विद्रोह हुआ...उसने ही द्वेष का रूप ले लिया और पता है उस द्वेष का बोझ उस दूसरी स्त्री के निरपराध बच्चे उठाते हैं..............आजीवन....जो जिन्दगी भर समझ ही नहीं पाते कि आखिर उनसे ऐसा क्या अपराध हुआ कि वह जिसे माँ कहते आ रहे हैं, वह उनसे प्यार ही नहीं करत

आखिर हम महिला मीडियाकर्मियों से आपको इतना भय क्यों है साहब?

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मैंने जब अपराजिता और शुभजिता शुरू की थी तो तय किया था कि यह लड़कियों की मीडिया में भागेदारी बढ़ाने का माध्यम बनेगी। इसका मतलब यह नहीं था कि मुझे लड़कों से लिखवाने या उनको टीम में लेने से आपत्ति थी बल्कि इसका कारण यह था कि मीडिया में लड़कियों की जगह पहले से ही बहुत कम है। अगर है भी तो उनको कोने में रखा जाता है मतलब फिलर की तरह..ताकि यह भ्रम बना रहे कि हम स्त्री विरोधी नहीं हैं क्योंकि हमारे मीडिया माध्यमों में लड़कियों की उपस्थिति को स्वीकार करने में हिचक है। मीडिया में रहते हुए यह पक्षपात पिछले 18 साल से देखती आ रही हूँ। निश्चित रूप से लड़कियों की जिम्मेदारी होती है और उनको अपने काम के साथ घर भी सम्भालना पड़ता है और इस वजह से उनके लिए उतना समय दे पाना सम्भव न होता मगर वे लगातार परिश्रम करती हैं। आज अगर महिलाएं काम कर रही हैं तो ऐसा नहीं है कि उनके लिए बहुत अधिक सुविधाएं दी जा रही हैं। यह जरूर है कि कुछ मीडिया संस्थानों में या कुछ सहकर्मियों की सदाशयता के कारण उनको छुट्टी मिलती है या कई बार उनकी परिस्थितियों को समझा जाता है मगर अधिकतर मामलों में लड़कियाँ यह ताना जरूर सुनती हैं कि '

रुढ़ियों का पिंजरा अगर सोने का भी हो तो भी वह पिंजरा ही है, उड़ान आसमान की होनी चाहिए

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वह घूंघट, हिजाब और परदे का समर्थन करते हैं क्योंकि उनको लगता है कि औरत बेशकीमती है और उस पर किसी की नजर नहीं पड़नी चाहिए। एक छोटा सा प्रश्न यह है कि औरतें बेशकीमती हैं तो पुरुष क्या हैं? पुरुष क्या कबाड़ हैं जो उनको यूँ ही भटकने के लिए खुली सड़क पर फेंक दिया जाए। गुलामी की जंजीर को अगर धर्म और समाज के नाम पर जेवर बनाकर पहन लिया जाए, तो भी वह जंजीर ही रहती है... आज मामला नौ सो चूहे खाय, बिल्ली हज को चली वाला हो गया है और उसके पीछे कहीं न कहीं सामाजिक और पारिवारिक स्वीकृति की चाह भी है और स्वीकृति के जरिए ही बड़े निशाने साधे जाते हैं। यही कारण हैं कि जींस पहनने वाली अभिनेत्रियाँ भी जनता के सामने जाते ही साड़ी पहनने लगती हैं। मजे की बात यह है कि पहनावा औरतों का, शरीर औरतों का, जीवन औरतों का और सिर फुटोव्वल मर्द कर रहे हैं। वह समाज औरतों को हथियार बनाकर लड़ रहा है जिसके मंच पर औरतों को देखा तक नहीं जाता। इस्लाम में बहुत कुछ गलत माना जाता है लेकिन आप वह सारे काम करती आ रही हैं और आपको कोई परहेज नहीं है लेकिन लोकप्रिय बनने के लिए और स्वीकृति के लिए आपने गुलामी को भी ग्लैमराइज करना शुरू क

बौद्धिक विमर्श से अधिक संवेदना का पर्व है छठ

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छठ पूजा मेरे लिए सिर्फ प्रकृति विमर्श है, यह यात्रा स्त्री विमर्श से आगे की है, याद रखिए हम सूर्य को पूजते हैं और छठी मइया उनकी बहन हैं माँ दुर्गा का कात्यायनी रूप और ये बात इस पर्व पर काफी कुछ पढ़ने के बाद कह रही हूँ, छठ स्त्री विमर्श का नहीं, जेंडर समानता का पर्व है, दिक्कत य़ह है कि कर्म कांड तो हम खूब करते हैं पर उसकी मूल बात नहीं पकड़ते.. जाति- वर्ण, सब कुछ कर्म से निर्धारित था, आपने सुविधा के लिए बर्थ राइट को आधार बना लिया, और राज करने लगे, भाग्य से कर्म नहीं बनते, आपका कर्म ही आपका भाग्य निर्माता है कर्म ही थे कि कर्ण को हम महारथी कहते हैं, किसी के घर में चांदी का चम्मच लेकर पैदा होना आपकी उपलब्धि नहीं है, आपने कोई तीर नहीं मारा, लेकिन अगर आप उस चम्मच का सदुपयोग करते हैं, उसका सुख वंचितों तक पहुंचाते हैं, तो वह आपका कर्म है, जमशेद जी टाटा, भाई हनुमान प्रसाद ,अजीम प्रेम जी . आज उदाहरण के लिए टाटा समूह को देखिए, मुझे उद्योगपति प्रेरित करते हैं, बहुत मुश्किल होता है अपना काम खड़ा करना... पर्व का सुख पूंजी के रास्ते ही आता है ...... रही हमारे स्त्री विमर्श क

किचेन पॉलिटिक्स.. शातिर घरेलू औरतों के खिलाफ मोर्चा खोलना जरूरी है

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किचेन पॉलिटिक्स...सुनने में बड़ा अजीब लगता था। रसोई और राजनीति..इनका क्या सम्बन्ध हो सकता है..रसोई में तो अन्नपूर्णा का निवास होता है। अब अन्नपूर्णा क्या जानें कि उनका प्रतिरूप कहलाने वाली स्त्रियाँ रसोई को हथियार बना सकती हैं और जिस भोजन को अमृत कहा जाता है, उसे अपने व्यंग्यबाणों से विष बनाने की कला भी जानती हैं। आमतौर पर इस देश में किसी भी गृहिणी को या तो बहुत उपेक्षा से देखा जाता है या फिर बहुत ही आदर से। इतना विश्वास या यूँ कहें कि अन्धविश्वास किया जाता है कि वह कुछ गलत कर सकती है या षडयंत्र रच सकती है...यह सोचना भी पाप लगता है लेकिन सत्य कुछ और है। यह स्त्रियाँ कुछ भी कर सकती हैं। वर्चस्ववादी राजनीति सिर्फ दफ्तरों या सियासत में नहीं होती बल्कि यह कहीं भी हो सकती है, घरों में हो सकती है और रसोई उसका शस्त्र होती है।  क्या अन्न का उपयोग ब्लैकमेलिंग के लिए, नीचा दिखाने के लिए या घर की सत्ता हासिल करने के लिए हो सकता है? हम विश्वास नहीं करना चाहते पर ये हो भी सकता है, होता है और होता चला आ रहा है। सास और ननदों से परेशान बहुओं को आप देखते आ रहे हैं...ससुराल में बेटियों का उत्पीड़न भी आप

अधिकार संरक्षण, स्नेह और करुणा से बनते हैं...सम्बन्धों के दावों से नहीं

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  मैथिलीशरण गुप्त की कविता है...माँ, कह एक कहानी...और उसमें अन्त में पँक्तियाँ हैं ...यशोधरा के प्रश्न के उत्तर में राहुल के माध्यम से कवि ने ये पँक्तियाँ कहलवायी हैं -  कोई निरपराध को मारे तो क्यों अन्य उसे न उबारे? रक्षक पर भक्षक को वारे, न्याय दया का दानी।"  भारत में परिवार का सम्बन्ध रक्त सम्बन्धों से लगाया जाता है,,,फिर भले ही वे कितने ही खराब क्यों न हों...उम्मीद की जाती है कि उनके हर जहर को व्यक्ति अमृत समझकर पी जाये...उनकी प्रताड़ना को अपना भाग्य समझकर स्वीकार कर ले...माँ तो माँ होती है...जैसे वाक्य...अब बहुत घिसे - पिटे हो गये हैं...मेरे लिए। ऐसा नहीं है कि संसार में माँ बुरी होती है...मनुष्य होती है...उसे उसी रूप में स्वीकार करना चाहिए। अच्छी बात है मगर मेरा सवाल यह है कि हर हाल में गलत को सही क्यों कहा जाना चाहिए? सम्बन्धों का सही अर्थ जीवन ने समझा दिया है..और अब मैं उसी रूप में स्वीकार कर रही हूँ। पता है कि परिवार व्यक्ति को ग्रांटेड क्यों लेता है क्योंकि वह मान लेता है कि लौटकर तो वह व्यक्ति उसी के पास आएगा...? बदलाव के लिए अब इस कहानी के अन्त को बदलना ही चाहिए...व्यक