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संयम, अनुशासन, सृजन, सकारात्मकता ..बस यही मंत्र हैं कोविड ही नहीं, जीवन के भी

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  जीवन में ऐसा समय आता है और ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं जब आप ही अपने पास होते हैं। यह समय आत्मविश्लेषण का होता है, चिन्तन का होता है और इसके लिए एकान्त जरूरी होता है। भीड़ में रहकर खुद से बात होनी मुश्किल होती है। जब यह पँक्तियाँ लिख रही हूँ तो समूचा विश्व कोविड -19 की चपेट में है, काल का तांडव, मृत्यु की विभीषिका है, प्रकृति के कोप से पूरा देश और पूरी पृथ्वी आक्रांत है और इस बीच बहस चल रही है, विवाद हो रहे हैं, ऑक्सीजन और दवाओं की कालाबाजारी हो रही है..एक दूसरे को नीचा दिखाने और कमतर साबित करने की होड़ लगी है...मुख पर प्रेम और हृदय में घृणा है..आस - पास के ऐसे लोगों को जाते देख रही हूँ जिनको देखते हुए बड़ी हुई...सीखा...मन क्लान्त हो पड़ा है...हम दिखावे की ऐसी दुनिया में जी रहे हैं जहाँ उदारता से लेकर रोग तक, सब प्रदर्शन की वस्तु बन गये हैं.. जरा सोचिए तो ईश्वर ने ऐसी ही दुनिया दी थी आपको? क्या ऐसा ही संसार दिया था..? यही देश था जहाँ लोग दीर्घायु हुआ करते थे...स्वस्थ रहा करते थे और तब आज की तरह महँगी चिकित्सा प्रणाली भी नहीं थी। आविष्कार हमारी आवश्यकता हैं परन्तु जब लालच की पूर्ति का हथ

मंदारमनी और सरप्राइज पार्टी वाली यादें...

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  हाँ...घूमना तो पसन्द है और समन्दर से बहुत लगाव है...ऐसा लगता है कि जैसे वह हर बार बुलाता रहा है...कोरोना के प्रकोप के कारण कोलकाता के बाहर निकलना नहीं हुआ। इस बार भी जाना लगभग अचानक ही हुआ,,,पिछले कुछ दिनों से कोरोना से परेशान उकताए लोगों को सोशल मीडिया पर तस्वीरें चिपकाते देख रही थी...तब भी मन नहीं हुआ। इसके पहले अपनी सहेली नीलम के साथ जा चुकी थी मंदारमनी....फिर क्यों...ऐसा लगा कि बस अब...निकल ही पड़ना चाहिए...तो हम निकल पड़े और मौका भी ऐसा मिल गया।  अप्रैल में आता है जन्मदिन हमारा...इस बार हमने अनायास मन बना लिया कि कुछ अपने लिए स्पेशल करना है...खुद को दुलार करना है....पहले अकेले जाने की ही तैयारी थी...लेकिन फिर लगा...कि इस बार भी किसी दोस्त को साथ लिया जायेगा औऱ यह निर्णय चामत्कारिक ही था...दरअसल, कहीं बाहर न निकल पाने के कारण कुछ अच्छा नहीं लग रहा था और लग रहा था कि एक मी टाइम बहुत जरूरी हो गया है। पापिया....जिसे सब पीहू पापिया...के नाम से जानते हैं....मैंने...उसे कारण भी बता दिया...वह नौकरी भी करती है तो व्यस्तता भी थी....लेकिन घुमक्कड़ वह भी अपने जैसी ही है औऱ मेरी तुलना में तो

होलिका....पितसत्ता का उपकरण बनने वाली स्त्रियों की नियति है

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होली का त्योहार मनाया जा रहा है...होलिका जलायी जा चुकी है...वैसे तो दशहरे पर रावण भी हर साल जलता है...मगर उसकी वाजिब वजह है...होलिका हो शूर्पनखा हो...दोनों ही तो भाइयों की महत्वाकाँक्षा की बलि चढ़ गयीं। दोनों को ही इस्तेमाल ही किया गया...देखने वाली बात यह है कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था का हथियार बनने वाली औरतों की नियति यही होनी थी..यही हुई। अगर इतिहास को देखा जाये तो पुरुषों के अहंकार के साथ ही  पितृसत्ता को प्रश्रय देने वाली स्त्रियों ने ही युद्धों की पृष्ठभूमि रची है और सीता हो या द्रोपदी के सिर पर दोष हमेशा से मढ़ा जाता रहा है। साहसिक अवतार वाली स्त्रियों को समाज ने हाशिये पर डाला है। हम होलिका की ही बात करें...यह सच है कि प्रह्लाद को लेकर गोद में बैठी और अति आत्मविश्वास इसका एक बड़ा कारण था लेकिन होलिका के पास क्या दूसरा विकल्प था...सत्ता से तो सबको भय रहता है..मरना तो उसे था ही मगर आप खुद प्रह्लाद की हत्या के षडयंत्र में भागीदार बनने का कारण क्या सिर्फ उसका निहित स्वार्थ था या भाई की सत्ता को बरकरार रखने की जिद या राजाज्ञा का भय...कारण जो भी हो..हम होलिका को विक्टिम नहीं मान सकते..

थप्पड़ के बहाने....प्यारी बहनों, अपने अधिकार लेना सीखिए और सजा देना सीखिए

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  भारतीय समाज में औरतों के साथ मारपीट, उनको कैद में रखना...या उनको मार डालना कोई नयी बात नहीं है। औरतें इसकी अभ्यस्त हैं मगर अब जाकर उनको पता लग रहा है कि वह जिस बात को सामान्य मानती आ रही थीं...वह सामान्य नहीं बल्कि उनका उत्पीड़न था। हाँ, आज घरेलू हिंसा पर ही बात करूँगी...महिलाओं के प्रति अपराध पर फिल्में बनाना फिल्मकारों के लिए ग्लैमर, सफलता और नाम कमाने की गारंटी देता है...कई अच्छी फिल्में बनीं भी हैं। कविताओं से लेकर किताबों में और किताबों से लेकर सिनेमा के सुनहरे पर्दे पर माँ, पत्नी और बहू की पीड़ा और प्रतिशोध बॉलीवुड का प्रिय विषय है...इस पर हाल ही में आई थप्पड़...खामोशी से बात करने वाली अलग सी फिल्म लगी...मुझे अच्छी लगी...तापसी का खामोश न रहकर प्रतिकार करना अच्छा लगा मगर पता नहीं क्यों...फिल्म देखते - देखते सवाल भी मन में उठा...घरेलू हिंसा को देखने और उसके प्रतिरोध को दर्ज करने की दिशा में हो रहे काम इतने एकांगी क्यों हैं? अगर ससुराल में बहू को दबाया जाना, उसके सपनों को मारना, उसके साथ गलत व्यवहार करना गलत है तो बेटी या बहन के साथ होने वाला ऐसा ही व्यवहार न्यायोचित और सामान्य क्

इतना पता है कि वह पास ही हैं... और हमेशा रहेंगी

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  गुरुओं की महिमा का बखान खूब होता आया है...विद्यार्थियों से उम्मीद ही की जाती है कि वे गुरु को देखकर ही साष्टांग दंडवत करें...ठीक उसी तरह जैसे कि सबसे छोटे बच्चों को न चाहते हुए भी किसी भी अपरिचित रिश्तेदार के पैर उसकी अनिच्छा के बावजूद छूने की उम्मीद की जाती है मगर सम्मान ऐसी चीज है जिसे आप चाहकर भी हर किसी को नहीं दे सकते। सिर के झुकने का मतलब आत्मा का झुक जाना नहीं होता बल्कि वहीं से कई बार चिढ़ और खीज भी उत्पन्न हो जाती है। इस मायने में मैं एक बेहद खराब छात्रा हूँ...मुझे नमस्ते कह देना पसन्द है पर मुझसे हर किसी की चरण वंदना नहीं होती...आप मुझे जी भर कोसिए...आलोचना सुन लूँगी मगर मैं जिसका दिल से सम्मान नहीं करती, उसके पैर छूना तो दूर उससे बात भी नहीं कर पाती... आप इसे कमजोरी कहिए या ताकत...मगर मैं जो सोचती हूँ, वह मेरे दिल के साथ चेहरे पर भी होता है... जिद्दी हूँ...स्पष्टवादी हूँ...और यह अ लोकप्रिय होने के लिए पर्याप्त गुण हैं....लेकिन इसके बावजूद भी कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपनी छाप छोड़ जाते हैं....जब आप सारी दुनिया से निराश हो चुके होते हैं तो ईश्वर आपको थाम लेता है और वह किसी दे

अकबर महान नहीं था और जोधाबाई स्त्रियों की विवशता का प्रतीक भर हैं

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साम्प्रदायिक सौहार्द बनाये रखने के चक्कर में शोषण की कहानियों को दबा दिया जाता है। अब तक अकबर को महान शासक बताया जाता रहा है...हम मानते भी रहे मगर हकीकत यह है कि अकबर एक अय्याश, स्वार्थी और लालची शासक था...। जिस जोधा के साथ उनके प्रेम के कसीदे पढ़े जाते हैं....वह अपने पिता की महत्वाकाँक्षा की शिकार रही...जैसा कि होता आया है...अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए बेटियों को दान किया जाता रहा है...हर हारने वाले ने अपनी बेटियाँ ही दान में दी...कभी बेटों को दांव पर नहीं लगाया...इतिहास के टुकड़ों को जोड़िए तो औरतों की जो हालत थी...उसे देखकर दिल दहल जाता है। वह एक सम्पत्ति से अधिक कुछ नहीं...उसका अपना अस्तित्व नहीं...अपना जीवन नहीं...वह एक वस्तु है...जिसमें घर से लेकर घरानों ने अपनी इज्जत खोज ली...शत्रु के हाथों से बचने के लिए उसे आग में या तो जल मरना होता है या पति के साथ मर जाना होता है और अगर वह मीरा बन गयी...तो जीवन भर यंत्रणा सहनी होती है।  राजस्थान ही नहीं...समूचे भारत की पितृसत्तात्मक परम्परा को अपनी मूँछों से कितना लगाव है...यह छुपा हुआ नहीं है। औरतों के आग में जल मरने की कहानियों में गौरव खोजने

देवी की जगह स्त्री को देखिए...महानता नहीं, सिर्फ करुणा ही दिखेगी

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कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जो दिखने में अलौकिक लगती हैं, गरिमामयी लगती हैं मगर गहराई में जाकर देखने पर वह मार्मिक लगने लगती हैं।  हम जिनको महापुरुष समझ लेते हैं, उनके प्रति कुछ हद तक निर्मम भी हो जाते हैं....उनके दुःख या सुख हो सकते हैं या उनका कोई निजी जीवन हो सकता है या उनके निजी क्षण हो सकते हैं..ये बात न तो हमारे दिमाग में आती है और न ही हम सोचने की जहमत उठाते हैं....नहीं..सच तो हम डरते हैं....इतिहास उठाकर देख लीजिए हमारी महा नायिकाओं या महा नायकों का जीवन कभी सुखमय नहीं रहा...और हमारे लिए तो बस इतना मान लेना काफी रहा...उनकी बात और है...वह महान थे...तभी तो कर सके...उनको पीछे हटने की इजाजत नहीं है...सच पूछिए तो...कौन महान बनना चाहता है...जवाब मिलेगा कोई नहीं...सब शांति चाहते हैं...सुख चाहते हैं....धन का नहीं...मन का सुख...जिस नरेन को दुनिया ने स्वामी विवेकानन्द बना दिया....वह क्या नहीं चाहते होंगे...अपनी माता के आँचल में रहना...क्या उनको नहीं खलता होगा...कि उनके सिर पर हाथ नहीं है...बेटे और माता में दूरी रही और अपनी दुनिया के दुःख या सुख के बीच दोनों ही पत्थर बनकर सब कुछ सहते रहे...नही