रेखा : आँधियों को आँखों की मस्ती से मात देती शम्मे फरोजा

जिसकी आँखों में कशिश और जिसने खामोशी से अपनी जिन्दगी गुमनाम इश्क के नाम कर दी। जिसने बचपन से ही तकलीफें देखीं, माँ की आँखों में आँसू देखे, पिता का छल देखा, उस रेखा ने अपना जन्मदिन इस साल मना लिया है। साँवली रंगत और एक साधारण चेहरे के लिए ताने सुनने वाली सावन भादो की उस रेखा ने जिन्दगी के 63 साल देख लिए....जिन्दगी को खामोशी से जीया, तोहमतें सुनते हुए जिया मगर खामोशी से ही सही अपनी शर्तों पर जीया...बचपन में जिन नायिकाओं ने मुझे प्रभावित किया...उनमें रेखा का नाम पहला था...जब पति की मौत के लिए रेखा को जिम्मेदार ठहराते हुए अखबारों में उनको मनहूस कहा गया तब भी रेखा मुझे भली ही लगीं। 
प्यार से वंचित...प्यार को तलाशती रेखा की जिन्दगी में बहुत से लोग आए...बॉलीवुड के नायकों की जिन्दगी में भी नायिकाएँ आती रही हैं मगर उनकी जिन्दगी पर कभी इस तरह सवाल नहीं उठे जिस तरह अकेली अपनी शिद्दत से जी रही इस अभिनेत्री को लेकर उठे हैं...एक ही तरह के जुर्म में दो अलग इंसाफ...ये हमारे समाज की हकीकत है। रेखा की माँग का सिंदूर...अखबारों की सुर्खियाँ बना और इसे न जाने कितने लोगों से जोड़ दिया गया...कई बार तो ऐसे नाम आए जो उम्र के लिहाज से भी रेखा से छोटे थे। दरअसल, रेखा की जिन्दगी हमारे समाज के दोहरेपन की कलई खोल देती है....फिल्मों में आना उनकी मजबूरी थी...महज 14 साल की उम्र में माँ ने रेखा को फिल्मों में काम करने के लिए मजबूर किया तो असमय ही बड़ा हो जाना पड़ा। 
रेखा की कहानी सब जानते हैं मगर उन सवालों पर बात होनी चाहिए जो हमारे समाज के दोहरेपन को सामने रख गये। पुरुष का छल सामान्य घटना बन जाती है और जब स्त्री करे तो वह एक अपराध बन जाता है...अगर किसी विवाहित व्यक्ति से उसके रिश्ते हैं तो उसे घर तोड़ने वाली बना दिया जाता है मगर जिस व्यक्ति ने अपने होशोहवाश में वह रिश्ता बनाया, उसे क्लीन चिट दे दी जाती है, प्यार दोनों ने किया...अपनी मर्जी से किया तो फिर घर  तोड़ने की जिम्मेदार औरत क्यों....उस पुरुष ने अपना घर खुद तोड़ा है....गलती दोनों की होती है मगर तमगा स्त्री  को दिया जाता है। रेखा के पिता ने रेखा की  माँ से शादी नहीं की मगर आज भी लोग उनको जानते हैं। वैसे रेखा तो अपने जन्‍म के साथ ही विवादों में आ गई थीं। क्योंकि रेखा की मां पुष्पावली बिन ब्याही मां बन गई थीं। पुष्पावली साउथ की फिल्मों की फेमस एक्ट्रेस हुआ करती थीं। वहीं रेखा के पिता जेमिनी गणेशन साउथ के सुपरस्टार थे। जेमिनी ने कभी पुष्पावली से शादी नहीं की। रेखा के जन्म के बाद पुष्पावली और जेमिनी के दो और बच्चे हुए। इस बात का जिक्र रेखा की ऑटोबायोग्राफी 'रेखा द अनटोल्ड स्टोरीमें किया गया है। जेमिनी पहले से ही शादीशुदा थे इसलिए उन्होंने अपनी पहली बीवी को कभी नहीं छोड़ा। मां बनने के बाद पुष्पावली का कॅरियर भी खत्म हो गया। कहते हैं कि रेखा अपने पिता जेमिनी से बहुत नफरत करती थीं। यहां तक कि जब उनके पिता का निधन हुआ था तो वो उनके आखिरी दर्शन के लिए भी नहीं गई थीं।
एक मोटी और सांवली लड़की ने जब बॉलीवुड में कदम रखा तो उसे दबाने के लिए बहुत से लोग बैठे थे और उसे धोखा देने के लिए भी। बात 1969 की फिल्म 'अनजाना सफर' के समय की है। महबूब स्टूडियो, मुंबई में डायरेक्टर राजा नवाथे की इस फिल्म की शूटिंग चल रही थी। फिल्म के पहले शेड्यूल में कुलजीत पाल, राजा और विश्वजीत ने रेखा के लिए एक प्लान बनाया। उस दिन रेखा और विश्वजीत के बीच एक रोमांटिक सीन फिल्माया जाना था। जैसे ही डायरेक्टर राजा नवाथे ने एक्शन बोला, विश्वजीत ने रेखा को अपनी बाहों में लिया और किस करने लगे। विश्वजीत ने जैसे ही रेखा को किस करना शुरू किया वे एकदम अवाक थीं। इस किस के बारे में उन्हें नहीं बताया गया था। कैमरा रोल होता रहा। लेकिन इस दौरान न डायरेक्टर ने कट बोला और न ही विश्वजीत ने रेखा को किस करना बंद किया। पूरे पांच मिनट तक वे रेखा को किस करते रहे। इस दौरान वहां मौजूद यूनिट मेंबर्स सीटियां बजा-बजाकर चीयर कर रहे थे। रेखा की आंखें बंद थीं। लेकिन उनसे निकलते आंसू साफ नजर आ रहे थे। 

विश्वजीत को कभी इसके लिए आलोचना नहीं सुननी पड़ी जबकि इस शोषण में वो भी शामिल थे। सीन के नाम पर कुछ भी जायज बनाया जा सकता है...हीरोईन न माने तो उसे धोखे में रखकर बॉडी डबल से इंटीमेट या रेप सीन फिल्मा लो...आसान है...। आयशा जुल्का के साथ दलाल फिल्म में ऐसा ही कुछ किया गया था...वह बस विरोध करती रह गयीं। खैर बात तो रेखा की हो रही है...साल 1966 में एक तेलगु फिल्म रंगुलारत्नम में एक बाल-कलाकार के तौर पर अभिनय की दुनिया में आगाज करने वाली रेखा की पहली हिंदी फिल्म साल 1970 में आई 'सावन भादोथी।
1972 में रणधीर कपूर के साथ फिल्म 'रामपुर का लक्ष्मण' से रेखा को पहचान मिली मगर तब तक रेखा एक सांवली और मोटी हीरोईन  ही थीं। 
हमारी खूबसूरती के मापदंड अभिनय से ज्यादा देह की रंगत से तय होते हैं...तीखे नैन – नक्श से तय होते हैं....हम जब भी बॉलीवुड के सितारों की तारीफ करते हैं...पहला वाक्य खूबसूरती पर ही ठहरता है....और दूसरा उसकी निजी जिन्दगी पर...अभिनय....फिल्में सब पीछे चले जाते हैं...यही कारण है कि आज भी शिल्पा, अनुष्का को सर्जरी करवाननी पड़ती है...ऐश्वर्या, दीपिका के साथ अपनी तमाम प्रतिभा के बावजूद काजोल को भी गोरा होना पड़ता है। आज की अभिनेत्रिया पेशेवर कारणों से खूबसूरती पर ध्यान दे रही हैं मगर उस जमाने में रेखा के बदलने की वजह फिल्मों के साथ वह एक शख्स भी था....जिसके बारे में कहा जाता है कि रेखा ने उससे बेहद प्यार किया...रेखा की माँग के सिन्दूर का रिश्ता उससे जोड़ा जाता है...जाने कितनी कहानियाँ बनती हैं....कहीं दोनों एक साथ पहुँच गए तो खबर  पीछे छूट जाती हैं...दोनों छा जाते हैं और इसके लिए उनको जरा भी कोशिश नहीं करनी पड़ती। रेखा और अमिताभ...की सादगी भरी खामोशी और खामोशी भरे एहसास कहीं न कहीं दुनियादारी सम्भाल रहे अमिताभ को बेचारगी और अपराध बोध से भरते होंगे? अपना स्टारडम और अपना घर बचाने के लिए रेखा से उन्होंने किनारा कर लिया और रेखा भी अपनी दुनिया में सिमट गयीं...मगर क्या अमिताभ के दिल में कसक की तरह रेखा और उनकी चाहत जिन्दा है

आप किसी शख्स से दूरी बना सकते हैं,  वह आपकी जिन्दगी से बाहर जा सकता है मगर उससे जुड़ी यादें और उससे जुड़े एहसासों को तड़ीपार नहीं किया जा सकता..वह आपकी आँखों की नमी में कहीं से भी छलक जाता है...क्या पता यही नमी जया को बेचैन कर जाती होगी...क्या पता यही नहीं जया को कुछ हार जाने का एहसास दिलाती हो....यही नमी रेखा में फख्र की मुस्कान ला देती हो....अगर ये कहानियाँ सच हैं तो ऐसा होना मुमकिन है। लेकिन साल 1976 कुछ अलग था. ये वो समय था जब रेखा ने खुद को बदल दिया....एक मोटी सांवली लड़की ने पहली बार शायद खुद पर ध्यान दिया...वह बदल गयी और ऐसी बदली कि आज 63 की उम्र में भी नयी और कमसिन लड़कियाँ उसके आगे फीकी नजर आती हैं...पता नहीं ये उसकी जिद का कमाल है या फिर इश्क का...जो भी है...उसे रेखा ने जीया है...पता नहीं क्यों मुझे रेखा बॉलीवुड की अमृता प्रीतम जैसी लगती हैं....दोनों की जिद एक जैसी लगती हैं...दोनों ने अपना इश्क जीया और खूब जीया।
उन्होनें अपनी हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू के साथ साथ अपने शरीर पर जमे फैट के साथ भी जंग लड़नी शुरु कर दी। रेखा को जानने वाले बताते हैं कि अपने पेट के हिस्से को कम करने के लिए वो पूरे जी जान से पसीना बहा रही थी। वो इतनी मेहनत करने लगी थी की उन्हें जानने वालों को हैरानी हो रही थी। वहीं अपने चेहरे और अपने मेकअप को भी उन्होनें गंभीरता से लेना शुरु कर दिया था. कभी लाइनर ना लगा सकने वाली एक लड़की अब मेकअप दादा से अपने लुक्स पर बात करने लगी थी। उनके बदलाव की कहानी किसी परी कथा से कम नहीं है।
कहते हैं कि रेखा दो महीने तक वो सिर्फ दूध की डाइट पर ज़िंदा रही। इससे वो पतला और 'गोरा' होना चाहती थीं, या कम से कम ऐसी उन्हें सलाह दी गई थी। 1970 में जब योगा का नाम लोगों ने ठीक से सुना नहीं था तब रेखा ने योगा और जीतोड़ वर्जिश से लगभग 30 किलो वजन घटा लिया था। बकौल रेखा भारत में उन दिनों थिएटर नुमा मेकअप किया जाता था जिसमें आखों के आसपास लंबा काजल, हेवी लिपस्टिक लगा दिए जाते थे. ऐसे में वो लंदन जाकर खुद मेकअप की टेक्नीक सीख कर आई।' रेखा ने मीना कुमारी के मेकअप आर्टिस्ट को भी अपने साथ रखा जो मरते दम तक रेखा के लिए काम करते रहे।
रेखा ने बातों बातों में अमिताभ की सलाहों और उनके ज़िंदगी में आने को ही अपने अंदर आए सबसे बड़े बदलाव के रुप में मानती थी। रेखा ने कहा, "अमित जी से मैंने समय की पाबंदी, शांति, कायदा, समर्पण, एकाग्रता और प्रोफेशनल होना सीखा है।
हालांकि अमिताभ बच्चन ने आज तक इस बात पर आधिकारिक कमेंट नहीं किया है, वो हमेशा बिना रेखा का नाम लिए इस बात का जिक्र कर देते हैं। वो कहते हैं कि 'वो' अगर ऐसा कहती हैं तो हम उनके आभारी हैं लेकिन इसमें हमारा कोई योगदान नहीं है।
दुनिया अकेली औरत की आँखों मे इन्तजार और उदासी देखना चाहती है....जिन्दगी को बेरंग देखना चाहती है मगर रेखा के गजरे और उनकी कांजीवरम साड़ियों के कलेक्शन के साथ उनके अल्हड़ अंदाज ने दुनिया को अक्सर झटके दिये हैं इसलिए वह खीझकर उसकी जिन्दगी की परतों को उधेड़ना चाहती है...और ऐसा करते -  करते वह हाँफ जाती है...मगर रेखा तो रेखा ही रहती है। रेखा की माँग का सिन्दूर लोगों को परेशान करता है...रहस्य पैदा करता है...जिस देश में पति की मौत के बाद स्त्री को जिन्दगी जीना छोड़ देना पड़े,वहाँ रेखा इन तमाम दायरों को तोड़ देती हैं...रेखा ने मीडिया की टीआरपी को जिन्दा रखा है। कोई भला बताए कि औरत के सिन्दूर, उसकी खूबसूरती और उसके श्रृंगार पर किसी के नाम का लेबल ही क्यों होना चाहिए...क्या यह काफी नहीं है कि वह जीना चाहती है....किसी मर्द का हक ही क्यों होना जरूरी है और क्या हमने कभी पुरुषों से ऐसे सवाल किये हैं...खबरों में उसकी विधवा सम्बोधन आम बात है....क्या उसका विधुर कहकर कभी बात होती है....क्या किसी की विधवा या विधुर होने तक ही जिन्दगी सिमट जाती है..। रेखा चीखती नहीं, रेखा हारती नहीं....रेखा को समाज बाँध नहीं पाया...भले ही आप उनके चरित्र और उनकी जिन्दगी को उधेड़ डालिए मगर आप उनकी खामोशी के आगे हमेशा हारेंगे। जब भी आप उनकी जिन्दगी पर हिसाब करेंगे...किसी विनोद...किसी विश्वजीत....और किसी अमिताभ के लिए अनायास ही तल्खी उभरेगी।
तमाम खामोशियों और स्टारडम की जिन्दगी को बचाने के बीच...अपने महानायकत्व को बचाने की जद्दोजहद के बीच किसी अमिताभ की आँखों का कोना हमेशा नम होगा...नमी हमेशा किसी जया को बेचैन करेगी...कोई रेखा कहीं एक बार मुस्कुरा उठेगी...लोग हमेशा उसकी जिन्दगी की परतें खोलेंगे और रेखा अपने कांजीवरम का आंचल लहरा कर पूछ लेंगी...इस शम्मे फरोजा को आँधी से डराते हो....और इस चुनौती के आगे तमाम किस्से ढह जाएँगे..रेखा हमेशा रेखा रहेंगी।





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