सामाजिक समरसता आम आदमी की भी जिम्मेदारी है



साहित्य की तरह पत्रकारिता भी समाज का प्रतिबिम्ब होती है। पत्रकारिता एक ऐसा औजार है, जिसमें समाज को जाँचा परखा जाता है। पत्रकार और समाचार पत्र भी इसी समाज का अंग होने के बावजूद अपना एक अलग महत्व रखते हैं। लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ होने के नाते उसकी जिम्मेदारी भी बड़ी होती है। डॉ. रत्नाकर पांडेय अपनी पुस्तक हिन्दी पत्रकारिता और समाचार पत्रों की दुनिया में कहते हैं कि जनसेवा और समाजसेवा ही सच्ची पत्रकारिता है। निर्भिक पत्रकार अन्याय को देखकर स्थिर चित्त नहीं रह सकता। सामाजिक समरसता को बरकरार रखने में निश्चित रूप से पत्रकारिता की बड़ी भूमिका है मगर आज के दौर में उसे निभाना आसान नहीं है। पत्रकारिता आंशिक रूप से साहित्य भी है इसलिए उसका सामाजिक सरोकार भी है। मेरा मानना है कि पत्रकार भावुक भले न हो मगर जब तक स्थिति को संवेदनशील होकर नहीं समझता, उसकी कलम में धार नहीं आ सकती है। पत्रकार की कलम में उसका व्यक्तित्व भी नजर आता है। कलम में ताकत है, तभी कहा गया है – कलम देश की बड़ी शक्ति है भाव जगाने वाली,
दिल ही नहीं दिमागों में भी आग लगाने वाली।
 बात जब आग की है तो यह ध्यान रखना भी आवश्यक है कि यह आग नफरत और द्वेष को जलाने की ताकत रखती हो। सामाजिक समरसता के लिए इन दोनों का जलना जरूरी है। समरसता का संबंध कहीं न कहीं समानता और निष्पक्ष रूप से परिस्थिति को देखना भी है मगर आज के दौर में जब समानता के नाम पर किसी भी एक पक्ष को सत्ता प्रश्रय दे तो पत्रकार के लिए यह उचित है कि वह अपनी बात रखे क्योंकि समरसता इस बात की छूट नहीं देती कि किसी एक वर्ग के साथ अन्याय हो और पत्रकारिता समरसता बनाने के लिए खामोश रहे। भारत में पत्रकारों ने इस दृष्टि में बड़ा काम किया और अँग्रेजों की विभाजनकारी नीतियों का विरोध किया और स्वाधीनता सँग्राम को खुलकर समर्थन दिया। पयामे आजादी में में बहादुर शहा जफर ने लिखा
हिन्दुस्तान के हिन्दुओं और मुसलमानों!
उठो, भाइयों उठो, खुदा ने इन्सान को
जितनी बरकतें अदा की हैं, उनमें सबसे
कीमती बरकत आजादी है।
पत्रकारों के कर्तव्य पर प्रकाश डालते हुए गाँधी जी ने हिन्द स्वराज्य में लिखा – किसी भी समाचार पत्र का पहला काम है लोगों के भावों को समझकर प्रकट करना, दूसरा काम है लोगों में जिन भावनाओं की आवश्यकता हो उन्हें जागृत करना तथा तीसरा काम है लोगों में अगर कोई दोष हो तो उन्हें किसी भी मुसीबत की परवाह न कर निर्भिकता से सबके सामने रख देना। पत्रकारिता और पत्रकारों की जिम्मेदारी की बात अक्सर की जाती है मगर इस दायित्वबोध के बीच कहीं न कहीं पत्रकारों के अधिकारों को भी स्वीकृति मिलनी आवश्यक जो बहुत कम मिलती है। सच तो यह है कि पत्रकार की कलम आज बँध सी गयी है, कुछ भी लिखने से पहले उसे याद रखना होता है कि अखबार या चैनल का सम्बन्ध किसके साथ अच्छा है और कौन उसे विज्ञापन देता है। ईमानदार और बेबाक पत्रकारों के लिए काम करना हमेशा से कठिन रहा है मगर उन्होंने हर बार अपनी जिम्मेदारी निभायी है। अक्षय कुमार जैन अपने एक लेख में कहते हैं कि लोकतंत्र उग्रवाद को स्वीकार नहीं करता। वह संतुलित होकर मध्यमार्ग पर चलना जानता है क्योंकि यह मार्ग ही दाएं और बाएं बाजू को टकराने से रोकता उनके मतिमंथन को जारी रखने का अवसर देता है। वे आगे कहते हैं कि लोकतंत्र में जिस प्रकार समाज अपनी गलतियों से सबक सीखता है, उसी प्रकार समाचारपत्र गलती करके भी इस बुनियादी सिद्धांत को प्रतिस्थापित करते हैं कि हमारे हित और अधिकार तथा हमारी व्यवस्था इसलिए सुरक्षित है क्योंकि वे स्वतंत्र हैं, जागरूक हैं, सक्रिय हैं।

नेशनल एंड पेन अमेरिकन प्रेस काँग्रेस, मैक्सिको के सन 1942 ई. के पत्रकार सम्मेलन के अवसर पर पत्रकार के लिए 10 धर्मसूत्र उद्घाटित किए गए थे, उसे शब्दशः प्रस्तुत किया जा रहा है –
अपने पत्र के सुनाम पर गर्व कीजिए। जोश के साथ अपने उत्साह पर व्यर्थ का अहंकार मत कीजिए।
2. पत्रकारिता में जड़ता यदि मृत्युवत है तो एकसुरापन (मोनोटोनो) साक्षात मृत्यु है।
3. अवसर मत खोइए, बहुज्ञ बनिए, नवीनतम प्रदर्शन से मत चूकिए।
4. व्यक्ति से बड़ा समाज है, सरकार से बड़ा देश। मनुष्य मर्त्य है, संस्था अमर है।
5. शत्रु और मित्र दोनों बनाइए, मित्र ऐसे हों जो आपसे आदर प्राप्त करें और शत्रु ऐसे जिनसे आप द्वेष न कर सकें।
6. आर्थिक और साहित्यिक, दोनों क्षेत्रों में आक्रमण का सामना आक्रमण से करिए। शांति से रहना है तो अपनी रक्षा के लिए सदा तैयार रहिए।
7. तलवार और पैसा, दोनों कलम के दुश्मन हैं। आवश्यकता पड़े तो सम्मान रक्षा के लिए जीवन और धन का बलिदान कीजिए।
8. दृढ़ बनिए पर दुराग्रही नहीं। परिवर्तनीय बनिए पर कमजोर नहीं। उदार बनिए पर हाथ बिलकुल ढीला मत छोड़िए।
9. स्पष्टवादी, स्वाभिमानी और स्फूर्त रहिए, तभी आपका सम्मान होगा।

10. जो कुछ छपा हो सबकी जिम्मेदारी लीजिए। व्यर्थ दोषारोप पाप है। प्रतिष्ठा की हानि करने वाली चीज न छापिए। घूस लेना और किसी का विज्ञापन लेख की तरह छापना पाप है। साथी पत्रकार की जगह लेने की इच्छा रखना, कम वेतन पर काम करना स्वीकार कर साथी पत्रकार को निकालना भी पाप है। रहस्य जतन से रखिए। पत्र स्वातंत्र्य या पत्र की शक्ति का उपयोग व्यक्तिगत लाभ के लिए कभी मत करिए।

पत्रकार अगर कटुता फैलाने के लिए काम करे तो वह पत्रकार नहीं है मगर पत्रकारिता ने अपना दायित्व निभाने का प्रयास हमेशा किया है। अगर ऐसा न होता तो सौहार्द को प्रोत्साहित करने वाली खबरें नजर नहीं आतीं। वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव कहते हैं कि पत्रकार को ऐसे मामलों में सजग रहकर तथ्य सामने रखने चाहिए। अयोध्या और रामजन्म भूमि का मामला पत्रकारों के लिए परीक्षा है कि क्योंकि यह मामला भी सामाजिक समरसता जुड़ा मामला है। राहुल देव मानते हैं कि पूरी तरह से कोई निष्पक्ष नहीं होता, पाठक भी नहीं, मगर सच तो यह है कि समूचा दायित्व पत्रकारों पर ही डाल दिया जाता है। सामाजिक समरसता पत्रकारों की ही नहीं आम आदमी की भी जिम्मेदारी है।





टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आखिर हम महिला मीडियाकर्मियों से आपको इतना भय क्यों है साहब?

रेखा : आँधियों को आँखों की मस्ती से मात देती शम्मे फरोजा

वह उपेक्षित, प्रताड़ित स्त्री....मेरी माँ है