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घर जिम्मेदारियों को साझा करने की जगह है, बोझ बनाने की नहीं

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कई बार यह देखना जरूरी हो जाता है कि आप कहाँ पर हैं.. क्या जब किसी बात के लिए खड़ा होना पड़ता है तो आपमें इतनी हिम्मत होती है कि आप उस बात पर अडिग रह सकें। हाँ, यह परीक्षा ही है जब आपको पुराने प्रतिमान ध्वस्त करने के लिए आगे आना होता है। अभी जो हालात हैं, हम उससे ही गुजर रहे हैं। बचपन से ही चूल्हे के पीछे माँओं, दादियों को देखा, ईंधन के तौर पर कोयला इस्तेमाल होता था, फिर दीदियों और बहनों को देखा। चूल्हे की आँच में वे खुद को झोंकती रहीं मगर घर के पुरुषों को कोई फर्क नहीं पड़ा, उनकी नजर में यह हमेशा से औरतों का काम रहा है। इस अघोषित नियम के कारण कई बार लम्बे समय तक घर की बहुओं ने मायके का मुँह नहीं देखा। लड़कों की शादी कर देने का बड़ा कारण यह भी है कि पत्नी घर आयेगी तो रसोई सम्भाल लेगी... घर का काम सम्भाल लेगी, इस बीच में यह सब भूल ही जाते हैं कि घर मे औरतों की अपनी जिन्दगी है, अपनी सोच है और एक हृदय भी हो सकता है जिसमें कुछ इच्छाएं होंगी। मैं नहीं जानती क्यों, लड़कों के हिस्से में घर की जिम्मेदारियाँ क्यों नहीं रखी गयीं, भारतीय पुरुषों में महिलाओं के प्रति यह जो मालिकाना भाव है, उस