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उत्पीड़न पुरुष ही नहीं महिलाएँ भी कर रही हैं, विरोध और कार्रवाई में भी संतुलन लाइए

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एतराज फिल्म क्या आपको याद है ? अगर याद है तो शायद आपको वह मुद्दा भी याद होगा जो फिल्म में उठाया गया था। एक महिला बॉस द्वारा अपने अधीनस्थ कर्मचारी पर दबाव डालकर यौन उत्पीड़न, प्रियंका चोपड़ा को महिला बॉस के रूप में खूब सराहा गया था मगर बहुत से लोग ऐसे होंगे जो पुरुष उत्पीड़न के मुद्दे को मुद्दा मानते ही नहीं हैं। बहुत से पुरुष ऐसे हैं जो इन परिस्थितियों से गुजर चुके हैं या गुजर रहे हैं मगर वे बात करने को तैयार नहीं हैं क्योंकि उनको लगता है कि उनका मजाक उड़ेगा या फिर औरत से दब गए वाली मानसिकता उनका जीना दूभर कर देगी। महिला हूँ, महिलाओं पर लिखती हूँ मगर इसके साथ ही मुझे यह मानने में कोई परहेज नहीं है कि हर महिला गाय नहीं हैं, कुछ ऐसी हैं जो लोमड़ी की तरह लड़कों का शिकार करती हैं और अपनी हवस का शिकार बनाती हैं (आपने सही पढ़ा, वे पुरुषों खासकर बच्चों से भी दुष्कर्म करने से पीछे नहीं हटतीं)। शर्म के साथ मुझे यह स्वीकार करना पड़ रहा है कि घरेलू हिंसा अधिनियम का दुरुपोग हो रहा है और इसका खामियाजा उन औरतों को भोगना पड़ रहा है जिनकी शिकायतों में सच था। बलात्कार की धमकी हथियार बन गयी है,

वह बहुत खटती है, वह सिर झुकाए रखती है, वह बहुत अच्छी है

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  औरतों की भोर तड़के ही होती है, इस भोर में उनके लिए सुबह एक कप चाय नहीं लिखी होती, लिखा होता है तो गैस का चूल्हा, सफाई, पति का नाश्ता, बच्चों का टिफिन और कामकाजी हुई तो अपने हिस्से का लंच। औरतें खुद को बाँटती नहीं हैं, अपनी जिम्मेदारियों को साझा नहीं करना चाहतीं। उनकी उम्मीदें बेटियों से जुड़ी होती हैं, ननदों से भी थोड़े संकोच से जुड़ी होती हैं मगर देवर, पति, बेटा या घर के बड़े इस दायरे में नहीं आते। अपने हिस्से की खुशियों को त्यागना उन्होंने जन्म से सीखा है, अपनी माँ को ऐसा करते हुए देखा है और अपनी बेटियों को भी वे ऐसा ही कुछ सिखाना चाहती हैं। आजकल बहुत सी माएँ बेटियों के मामले में ऐसा नहीं करतीं तो कहीं न कहीं, यह व्यवस्था के प्रति उनका विद्रोह ही है, वे बेटियों को एक बेहतर जिन्दगी देना चाहती हैं। बेटियों को ससुराल भेजना है इसलिए न चाहते हुए भी उनको ऐसा करना पड़ता है। हमारे समाज में औरतों के अच्छा कहलाने के लिए कुछ नियम तय हैं....वह बहुत खटे, सिर झुकाए रखे, जवाब नहीं दे और सवाल नहीं करे। समाज को गूँगी औरतें पसन्द हैं। हमारी फिल्में भी यही सिखाती हैं, क्या आपने बॉलीवुड की किसी

भारतीय लड़कियाँ हार गयीं मगर जश्न मनाइए क्योंकि आप उनको पहचानने लगे हैं

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वह पहले भी खेलती थीं मगर आप चैनल बदल देते थे, अब आपने पहली बार इन लड़कियों को देखा है। पहली बार शायद  महसूस किया है कि क्रिकेट की दुनिया में उनका अपना अस्तित्व है, ये शायद आप पहली बार महसूस कर रहे हैं। हाँ, ये लड़कियाँ विश्व कप घर नहीं ला सकीं, ये सच है मगर उससे भी बड़ा सच यह है कि वो लड़ीं, विकेट का धड़धड़ाकर गिरना एक कमजोरी है, निश्चित रूप से है मगर हार के बाद उन उदास चेहरों में एक जिद ने जन्म लिया है। ये लड़ने की जिद है, ये भारत है, यहाँ लड़कियों को पढ़ने के लिए लड़ना पड़ रहा है, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे अभियानों की जरूरत पड़ रही है, वहीं ये लड़कियाँ उस टीम से भिड़ गयीं जो 3 बार विश्व विजेता रह चुकी हैं। मुझे तो लगता है कि भारत ही नहीं दुनिया के दूसरे देशों में भी महिला क्रिकेट को लेकर शोर नहीं होता मगर अब शोर होगा। मुझे इंतजार है उस दिन का जब जब सचिन और विराट के बीच हरमनप्रीत, सुषमा, पूनम के लिए शोर होगा....उनके पोस्टर बाजारों में वैसे ही उपलब्ध होंगे जैसे पुरुष क्रिकेटरों के हैं। भारत में खेलना और उसे कॅरियर बनाना अभी भी मुश्किल है। लड़कियों को लड़ना पड़ता है, जूझना पड़त