पितृसत्ता नहीं, मातृसत्ता ही रही है भारत की शाश्वत परम्परा



भारत में मातृ सत्ता को हमेशा से महत्व दिया गया है..अगर प्राचीन भारत पर दृष्टि डालें तो देवियों और मातृ शक्ति को दर्शाने वाले कई मंदिर और यत्र - तत्र प्रतिमाओं में बिखरा इतिहास गवाही देता है। एक खास बात यह कि मातायें आज की तरह निरीह, निर्भर और करुणा तक सीमित नहीं होती थीं बल्कि उनकी प्रशासनिक व आर्थिक स्तर पर समाज में भागीदारी होती थी। ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ स्त्रियों ने अपनी संतानों को अकेले बड़ा किया...यहाँ तक कि मध्यकालीन भारत में भी आपको ऐसे उदाहरण मिलते हैं मगर यह सत्य है कि इस मातृसत्तात्मक परम्परा को हाशिए पर डाला गया और धीरे - धीरे स्त्रियों के जीवन पर पितृसत्ता का आधिपत्य हुआ।
 यहाँ तक कि प्राचीन भारत में स्वयम्बर अथवा विवाह विच्छेद का अधिकार भी स्त्रियों को प्राप्त था मगर सभी जानते हैं कि आज के युग में स्त्रियों की स्थिति क्या है और एक बार फिर धीरे - धीरे स्त्रियाँ जागरुक हो रही हैं, यह अच्छी बात है और सरकारी स्तर पर सहयोग मिल रहा है।
यह अच्छा है मगर अब समय आ गया है कि मातृत्व की छवि और परिभाषा को संतुलित किया जाए। सिर्फ करुणा और निर्भरता के आधार पर स्वस्थ समाज नहीं बन सकते इसलिए जरूरी है कि परवरिश में स्त्रियाँ विवेक, निष्पक्षता और अनुशासन का भी प्रयोग करें क्योंकि अपराध की जड़ें अंततः संतान की परवरिश तक ही जाती हैं मगर इस आलेख में प्राचीन भारत में मातृ शक्ति के अस्तित्व पर और उसकी शक्ति पर अधिक बात करेंगे और यह विषय काफी विस्तृत है।
हड़प्पाकालीन मातृ देवी की प्रतिमा
सुविख्यात पाश्चात्य इतिहासवेत्ता अर्नाल्ड टायनबी के शब्दों में “आज के उन्नत और विकसित, सभ्य कहे जाने वाले देशों के लोग जिस समय नदियों और तालाबों, झरनों में घुटनों के बल झुककर जानवरों की तरह पानी पीते थे, तब भारत वासियों ने भूगोल, खगोल, विज्ञान, चिकित्सा, यंत्र विद्या के साथ गुह्य विधाओं का भी असाधारण विकास कर लिया था।
 आज का मानव चन्द्रमा पर पहुँचने में विज्ञान के बल पर अब समर्थ हुआ है। लेकिन भारत के प्राचीन महर्षि अपने योगबल से लोक लोकान्तरों का भ्रमण कर आते थे।” प्रश्न उठता है इतिहास में तो इसका विवरण मिलता नहीं।
 इसका उत्तर उक्त इतिहासकार ने इस प्रकार दिया है कि - “ भारतीय महर्षियों ने इतिहास लेखन को कभी महत्व नहीं दिया, क्योंकि उनकी दृष्टि में भौतिक घटनाओं से भी अधिक मूल्यवान दूसरी उपलब्धियाँ थीं।
 उन्होंने साँकेतिक भाषा में वैदिक साहित्य में सूत्रबद्ध कर दिया और उन्हें उपलब्धियों के बल पर ही हजारों वर्ष पूर्व भारत ने ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में आश्चर्यजनक प्रगति कर दिखाई।
छठीं शताब्दी की मातृ देवी की प्रतिमा

यह सोचने वाली बात है कि जिस समाज में गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषी नारियाँ हों, वहाँ किस आधार पर स्त्रियों और शूद्रों को वेद, पुराण पढ़ने से वंचित किया गया? इसका सीधा कारण यह है कि पितृसत्ता नहीं चाहती थी कि स्त्रियाँ अपना गौरवशाली इतिहास और अधिकार जान सकें...और उनके साथ होने वाले छल से परिचित हों तो जाहिर है कि यह स्त्रियों के विरुद्ध पितृसत्ता का संचालन करने वाले नियामकों का षडयंत्र था। जरूरी है कि आज हम उन वेदों, उपनिषदों और तमाम परम्परागत साहित्य को पढ़ें और सत्य जानने के लिए संस्कृत पढ़ें क्योंकि मूल साहित्य में क्षेपक जोड़कर और उसे तोड़ - मरोड़कर पितृसत्ता ने अपने लाभ का साधन बनाया है जबकि वह मूल रचना का अंग ही नहीं है। उदाहरण के लिए मूल महाभारत में जब 8 हजार श्लोक ही हैं तो वे 1 लाख श्लोकों तक कैसे पहुँचे..इसका पता लगाना आवश्यक है।
वाल्मिकी रामायण में जो प्रसंग हैं ही नहीं, उनको तुलसीदास ने रामचरित मानस में कैसे रख दिया...यह पूछा जाना चाहिए क्योंकि श्रीराम के समकालीन वाल्मिकी की रामायण कहीं अधिक प्रामाणिक और वास्तविक है। इसके बावजूद लोकमानस पर रामचरित मानस का आधिपत्य है और सत्य तो यह है कि उनमें जरूरी प्रश्नों पर बात ही नहीं की जाती। मध्यकालीन कवि सूरदास भी श्रीकृष्ण के कर्मयोगी, उनकी राजनीति और उन तमाम प्रसंगों पर बात नहीं करते और न ही वे वे प्रसंग उठाते हैं जहाँ स्त्रियों के प्रति कृष्ण का लोकतांत्रिक स्वरूप दृष्टिगोचर होता है। उनका समूचा वर्णन बाललीलाओं और रासलीला तक सिमट जाता है जबकि राजनीतिक मार्गदर्शन तत्कालीन भारत की आवश्यकता थी।
अतीत के भारत में ऐसा कोई विधि निषेध नहीं था, कि ज्ञान का क्षेत्र नारी के लिए वर्जित है और उसमें स्त्रियों को कोई भाग नहीं लेने दिया जाना चाहिए। ज्ञान क्षेत्र में नारी अनादि काल से ही नर के समान ही रही है। अनेक वेद मंत्रों के अवतरण में ऋषियों के ही नहीं, ऋषिकाओं के भी नाम मिलते हैं। नर और नारी को समान ऋषिपद प्राप्त होता था। वैदिक ऋचाओं की दृष्टा के रूप में विश्ववारा, गोधा, सरमा, अपाला, घोषा, शची, लोपामुद्रा आदि ऋषिकाओं का बड़ा सम्मानपूर्ण स्थान था। यही नहीं सर्वोच्च सप्तऋषि पद तक में नारियों को स्थान मिलता था। अरुन्धती का सप्त ऋषि पद पाना सर्वविदित है, पर आज स्थिति सर्वथा उलटी है। इन सब तथ्यों को भुलाकर महिलाओं को वेद मन्त्रों के पाठ तक का अधिकारी भी नहीं माना जाता। यह दुःख के साथ आश्चर्य की भी बात है कि जब नारियाँ वेद मन्त्रों की दृष्टाएं हो सकती हैं तो वेद मन्त्रों के पढ़ने की अधिकारिणी कैसे नहीं हो सकती हैं ? यह छोटी सी बात भी नहीं समझी जाती।
अध्यात्म और ज्ञान के क्षेत्र में नर और नारी का भेद करना किसी भी दृष्टि से युक्ति संगत नहीं ठहरता। ब्रह्म को लिंग भेद से परे माना जाता है। उसके अव्यक्त रूप को मानवी बुद्धि समझ नहीं पाती। प्राणी उसे समय सके इसलिए ब्रह्म ने स्वयं को व्यक्त किया, तो नर और नारी दोनों के रूप में प्रकट हुआ।

नर के रूप में वह परम पुरुष के रूप में प्रकट हुआ तो नारी के रूप में उसे आदि शक्ति परमचेतना कहा जाता है। पुरुष और प्रकृति के जिन दो नामों से उसे जाना जाता है उनमें एक पुल्लिंग हैं, तो दूसरा स्त्रीलिंग। शास्त्रों में ब्रह्म के तीनों रूपों को जहाँ ब्रह्मा, विष्णु, महेश कहा जाता है वहीं उसे आदि शक्ति, महासरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली के रूप में भी व्यक्त हुई माना जाता है। पुराणों में जहाँ कहीं भी देवासुर संग्राम का वर्णन आता है, वहीं यह उल्लेख भी मिलता है कि देवता जब पराजित होने लगते थे तो देवी शक्ति किसी न किसी रूप में उनकी सहयोगिनी बनकर आगे आती है और उन्हें विजयी बनाती थी। यह सारे तथ्य नारी की दृष्टि से अध्यात्म क्षेत्र में कनिष्ठ समझने वाली मान्यता को निरस्त करते और अप्रामाणिक ठहराते हैं।
आज तमाम प्रतिबन्धों और निषेधों के कारण नारी यदि इस क्षेत्र में अपेक्षित प्रतिभा नहीं प्रदर्शित कर पा रही है तो उसका कारण यह नहीं है कि वह सदा से अयोग्य या अक्षम रही है। वस्तुस्थिति यह है कि जिन दिनों नारी आगे बढ़ने और अपनी प्रतिभा को विकसित करने के लिए स्वतंत्र थी, उन दिनों उसने हर क्षेत्र में अपनी योग्यता और उपयोगिता की धाक जमा रखी थी। सत्यवती, कुन्ती, कौशल्या और कैकयी ऐसी मातायें थीं जिनको अधिकार प्राप्त थे और कई बार तो समूची राजसत्ता का संचालन भी वे करती थीं। यहाँ तक कि पालन करने वाली यशोदा मइया को भी समुचित स्थान मिला है..मध्यकालीन भारत में पन्ना धाय और शिवाजी की माता जीजाबाई का अवदान किसी से छुपा नहीं है।
दशावतार मंदिर में द्रोपदी प्रतिमा, उत्तर प्रदेश में देवगढ़ में है

क्या आप कैकयी और सीता, उर्मिला और शूर्पनखा के बगैर रामायण की कल्पना कर सकते हैं?
कई चरित्रों का तो चित्रण ही नहीं किया गया मसलन श्रीराम की बड़ी बहन शांता के बारे में न के बराबर लिखा गया है जबकि इन चारों भाइयों के जन्म में शांति और उनके पति ऋषि शृंग की बड़ी भूमिका थी। अम्बा, सत्यवती, गंगा, द्रौपदी, कुन्ती, गान्धारी का चरित्र निकाल देने पर महाभारत की महत्ता क्या रह जाएगी ? पाण्डवों का सारा जीवन संग्राम ही अधूरा रह जाएगा। इसी प्रकार भागवत् में से देवकी, यशोदा और गोपियों का चरित्र हटा दिया जाए तो कृष्ण एक साधारण पुरुष बनकर रह जाएंगे।
 शिवजी के साथ पार्वती, विष्णु के साथ लक्ष्मी का नाम हटा लिया जाए तो इनके चरित्र आधे अधूरे रह जाएंगे। इनमें से किसी का चरित्र महज करुणा पर निर्भर नहीं है और ये सभी सशक्त स्त्रियाँ हैं। दुर्गा और काली हाथ में शस्त्र लिए हैं तो कामाख्या देवी तो मासिक धर्म या पीरियड्स जैसे बिन्दुओं पर तत्कालीन समाज की उदार विचारधारा का प्रतीक हैं। ऐसी स्थिति में हास्यास्पद है कि मंदिरों में पीरियड्स या वस्त्रों के आधार पर महिलाओं को भीतर जाने से रोका जाता है जब कि आपके तमाम मंदिरों में जिन देवियों की प्राचीन प्रतिमायें पूजी जाती हैं, उनमें वस्त्र को लेकर ऐेसे बंधन ही नहीं हैं। जब पृथ्वी पर भगवत् शक्ति के अवतरण की आवश्यकता हुई तो मनु तप करने लगे। उनका अकेले का तप सफल नहीं हुआ तो मनु पत्नी शतरूपा भी तपश्चर्या में लगीं। फलतः तप सफल हुआ और शतरूपा ने कौशल्या के रूप में राम को अपनी गोद में खिलाया।
इसी प्रकार भगवान के अवतरण हेतु द्वापर में पुनः आवश्यकता अनुभव हुई। प्राचीन उदाहरणों से सीख ग्रहण कर महर्षि कश्यप ने अपनी धर्मपत्नी अदिति के साथ तप किया। अदिति यशोदा बनीं और उन्हें पूर्ण कला के अवतार भगवान कृष्ण का पालन पोषण करने का श्रेय मिला। राम और कृष्ण भगवान हैं। अवतार सिद्धान्त के विरोधी भी उन्हें महापुरुष मानते हैं, पर जिनकी कोख से उन्होंने जन्म लिया, जिनकी गोदी में पैर पसारे, जिनका दूध पिया और जिनका संरक्षण और दुलार पाया उन माताओं का गौरव व राम और कृष्ण से बढ़कर ही है, कम नहीं। भगीरथ द्वारा गंगावतरण के लिए तपश्चर्या की कथा सर्वविदित है। पर बहुत थोड़े लोग जानते हैं कि सूखे विन्ध्याचल को हरा भरा बनाने के लिए अत्रि ऋषि की पत्नी अनुसूईया ने तपश्चर्या की और चित्रकूट से मन्दाकिनी नदी को बने के लिए विवश किया। इस उपाख्यान का उल्लेख रामचरित मानस के अयोध्याकाण्ड में भगवान राम के चित्रकूट निवास के प्रसंग में मिलता है।
राष्ट्रीय  संग्रहालय में संरक्षित गंगा
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सन्तति निर्माण में माता की भूमिका पिता से हजार गुना अधिक है। देवी उशिज ने अपने पुत्र कक्षिवान को अपने ही संरक्षण सान्निध्य में रखकर शिक्षा दी थी और उसे विद्वान बनाने के अतिरिक्त योग विद्या में निष्णात बनाया। योग विद्या के प्रकाण्ड विद्वान और मर्मज्ञ ऋषि पंचिशिख, जिन्होंने इस विषय पर कई ग्रन्थ लिखे हैं। उनमें महर्षि ने स्वयं स्वीकार किया है कि यह ज्ञान उन्हें अपनी माता सुलभा से मिला। भरत जिनके नाम पर आगे चलकर इस देश का नाम ही भारत वर्ष पड़ गया, उनका पालन पोषण अकेले वनवासिनी शकुन्तला ने किया था। वह इतना पराक्रमी था कि बचपन से ही शेर के बच्चों के साथ खेलता था। निष्ठा और लगन के प्रतीक माने जाने वाले ध्रुव का पालन पोषण भी अकेले उनकी माता सुनीति ने वन में किया था। अपने शिखण द्वारा उन्होंने ऐसे संस्कार दिये कि ध्रुव ने बचपन में ही जीवन के रहस्य को पा लिया।
 परमात्मा की अनुभूति को धारण कर उन्होंने आगे चलकर देश को कुशल प्रशासन दिया। लव-कुश का पालन पोषण वाल्मीकि के आश्रम में अभावग्रस्त स्थिति में सीता ने ही किया और उन्हें इस योग्य बनाया कि अजेय हनुमान तथा लक्ष्मण को भी उनके सामने पराजित होना पड़ा। राजा शान्तनु ने जब गंगा के साथ विवाह किया तो गंगा ने यह शर्त रखी कि उनकी सभी सन्तानें सरिता तट पर ऋषि आश्रमों में भेज दी जाएंगी। इस समझौते के अनुसार सात पुत्र तो ऋषि आश्रम में भेज दिए गए, जो सातवसु के नाम से प्रसिद्ध हुए। अन्तिम आठवीं सन्तान थी भीष्म। शान्तनु के अनुरोध पर गंगा इस बात के लिए राजी हो गयीं कि राज्य संचालन के लिए उन्हें छोड़ा जाए, लेकिन उनकी शिक्षा दीक्षा स्वयं गंगा के निर्देशन में रहे। हाँ, भीष्म अपने भाइयों की तरह रहे ब्रह्मचारी ही। महर्षि पुलोमा की पुत्री शची महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में रहकर ज्ञान - विज्ञान में प्रवीण बनी थी। उसकी साधना तथा प्रतिभा से प्रभावित होकर देवराज इन्द्र उसे माँगने के लिए पुलोमा के द्वार पर पहुँचे। वहीं ऋषि कन्या शची आगे चलकर इन्द्राणी बनी।
महिषासुर मर्दिनी

मनु ने जब वाजपेय यज्ञ किया तो कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं दिखाई दिया जो उसे महायज्ञ का पौरोहित्य सम्हाल सके। उस स्थिति में मनु ने अपनी पुत्री और उस काल की महान मनीषी इला को यज्ञाचार्य नियुक्ति कर उस अनुष्ठान को सम्पन्न कराया। महाराज जनक दरबार में महाविदुषी गार्गी और महर्षि याज्ञवल्क्य का शास्त्रार्थ प्रसिद्ध है। इस शास्त्रार्थ में याज्ञवल्क्य को गार्गी के पाँडित्य और वैदुष्य का लोहा मानना पड़ा। उन दिनों गार्गी के समतुल्य विदग्धा, उद्दालिका, वीचावली, अनुसूया, गौतमी, यमी, सूर्या आदि विदुषियाँ भी प्रख्यात थी। इसी प्रकार आद्य शंकराचार्य और मंडनमिश्र के शास्त्रार्थ में मंडन मिश्र की पत्नी देवी भारती निर्णायक बनी थीं। यह भी हो सकता था कि वे पक्षपात कर अपने पति को विजयी घोषित कर देती। लेकिन शास्त्रार्थ में प्रतिवादी की भूमिका निभाने वाले आचार्य शंकर एवं अन्य विद्वानों को देवी भारती की निष्पक्षता पर पूरा भरोसा था तथा उस महान विदुषी महिला ने अपने पर किए गए विश्वास को प्रमाणित कर निष्पक्ष निर्णय भी दिया। आचार्य स्वयं उसकी विद्वता से प्रभावित हुए और उसे देवी सरस्वती की उपमा दी। दक्षिण भारत के प्रसिद्ध ज्योतिष विद्वान भास्कराचार्य द्वारा रचित “सिद्धाँत शिरोमणि” पुस्तक का उत्तरार्द्ध उनकी पुत्री लीला द्वारा ही लिखा गया था, यह सर्वविदित है।

ज्ञान और विद्वता के क्षेत्र में ही क्यों शौर्य, साहस और पराक्रम में भी भारतीय नारी आगे थी। शिवधनुष जो राजा जनक के महल में रखा था और अच्छे अच्छे बलवीर उसे उठा नहीं पाते थे, सीता ने उसे उठाकर दिखाया। तभी जनक को सीता स्वयंवर में यह शर्त रखनी पड़ी कि जो इस धनुष को तोड़ देगा, उसके साथ ही सीता का विवाह होगा। इन्द्र ने शम्बर से युद्ध के लिए राजा दशरथ से सहायता माँगी। दशरथ अपनी सेना सहित इन्द्र की ओर से लड़ने गए। उस युद्ध में कैकेयी भी साथ गयी थीं और अपने पति को भारी प्राण संकट से बचाया था। उसी से प्रसन्न होकर दशरथ ने दो वरदान देने का वचन दिया था। एक बार श्रीकृष्ण से चित्रसेन गंधर्व को उसके छोटे से अपराध का बड़ा कड़ा दण्ड दे दिया। चित्रसेन अर्जुन को शरण आया। शरणागत की रक्षा का प्रण निभाने के लिए अर्जुन ने श्रीकृष्ण का सामना किया।
 उस समय अर्जुन के रथ का संचालन द्रौपदी ने बड़ी कुशलता के साथ किया था। कृष्णार्जुन युद्ध में यह कथा बड़े विस्तार के साथ आती है। कौटिल्य अर्थशास्त्र में धनुर्धारी महिलाओं का उल्लेख मिलता है और यह भी वर्णन आता है कि उन्हें लड़कों के समान ही शिक्षा दी जाती थी। धर्म और समाज, संस्कृति की सेवा के लिए भी नारियों ने बढ़ चढ़ कर बलिदान प्रस्तुत किए हैं। आचार्य बृहस्पति की पुत्री देवहूति और भावभव्य की कन्या रोमशा अपने पिता तथा पति से आज्ञा लेकर विभिन्न क्षेत्रों में धर्म प्रचार के लिए गयी थीं। अभ्रण ऋषि की कन्या ने तो एक गुरुकुल भी खोल रखा था, जिसमें छात्र - छात्राओं को समान रूप से प्रवेशाधिकार थे। यशोधरा न होती तो सिद्धार्थ गौतम बुद्ध कैसे बनते? जयशंकर प्रसाद की ध्रुवस्वामिनी एक ऐतिहासिक चरित्र ही है जिसे ध्रुवदेवी के नाम से जाना जाता है और जिसने अपने क्लीव पति रामगुप्त का तिरस्कार किया था।
कामाख्या देवी, जहाँ योनि की पूजा होती है और देवी रजस्वला भी होती हैं.

नेतृत्व का जहाँ तक प्रश्न है महिलाएं उसमें भी पीछे नहीं रही हैं। इन्द्र को दिशा निर्देश तो इन्द्राणी ही देती थीं। धृतराष्ट्र तो राज्य संचालन में असमर्थ थे। यह कार्य उनकी पत्नी गाँधारी ही करती थी। ऐतिहासिक तथ्यों को देखें तो राज्यश्री, रानी पद्मावती, लक्ष्मीबाई, अहिल्याबाई होल्कर जैसे अगणित उदाहरण हैं। उदाहरणों का अन्त नहीं। सर्वविदित है कि महान विदुषी विद्योत्तमा का विवाह अशिक्षित कालीदास से हुआ था। विद्योत्तमा इतनी विद्वान थी कि उसने विवाह के लिए शास्त्रार्थ की शर्त रखी थी। कई विद्वान आए, उन्होंने शास्त्रार्थ किया और हार गए। अन्त में चिढ़कर छल बल से उन्होंने मूढ़ कालीदास से उसका विवाह करा दिया। विद्योत्तमा को जब इस बात का पता चला तो उसने अपने पति को उत्तेजित किया और उसमें ज्ञान के प्रति लगन पैदा की। इसके बाद उनके अध्ययन की अच्छी व्यवस्था बना दी। जिसके फलस्वरूप मूढ़मति कालीदास, महाकवि कालीदास बन गए।

मातृ देवी शिशु के साथ
 इसी प्रकार रत्नावली ने अपनी सुख सुविधाओं को तिलाँजलि देकर अपने पति तुलसीदास की प्रतिभा को कामुकता से ईश्वरभक्ति की ओर मोड़ दिया। यह रत्नावली का ही सत्साहस था जिसने समाज को तुलसीदास जैसा सन्त और रामचरितमानस जैसा महान ग्रन्थ उपलब्ध कराया मगर खुद तुलसी ने रत्नावली को समुचित महत्व सम्भवतः नहीं दिया। स्वयं रत्नावली भी उच्च कोटि की साहित्यकार थी और उसकी लिखी कई रचनाएं इन दिनों भी उपलब्ध हैं।
 प्रसिद्ध विद्वान वाचस्पति मिश्र को अपने ग्रन्थ लेखन कार्य में लगे रहने देने के लिए उनकी पत्नी भामती ने उपार्जन और निर्वाह की व्यवस्था जुटाने का दायित्व स्वयं सम्हाला था।
 वह मूँज की रस्सी बंटती थी और उससे जो भी उपार्जन होता था उसी से अपना और अपने पति का निर्वाह चलातीं। मैत्रेयी महर्षि याज्ञवल्क्य की पत्नी थी। वह किसी साँसारिक सुख के लिए नहीं अपितु विशुद्ध आत्म साधना के लिए उनकी सहधर्मिणी बनी। साँसारिक सुखेच्छा के बारे में उनसे पूछा गया तो उन्होंने साफ इन्कार कर दिया।

राजकुमारी सुकन्या ने अन्धे और अति वृद्ध च्यवन महर्षि से केवल इसलिए विवाह किया था कि वह उनकी तपस्या एवं शोध के लिए आवश्यक साधन जुटा सके। उपयुक्त सेवा सहायता कर सके।

राजा अश्वपति की प्राणप्रिय पुत्री विदुषी एवं अति रूपवती पुत्री राजकुमारी सावित्री ने एक वनवासी और निर्धन युवक सत्यवान से मात्र इसलिए विवाह किया कि वह उसके वनौषधि शोध कार्य में सहायक होकर लोक मंगल के लिए महत्वपूर्ण योगदान दे सके। कहने का आशय यह है कि हमारी परम्परा में स्त्री महज करुणा का आधार नहीं है...उसका व्यक्तित्व बेहद सशक्त रहा है इसलिए उससे ममता की प्रतिमूर्ति बताकर अन्य योग्यताओं को खारिज करना गलत है। वैसे होना तो चाहिए कि समाज में एक समान सत्ता हो मतलब मातृसत्ता और पितृसत्ता का समन्वय, मगर ऐसा होना अभी बहुत कठिन है इसलिए जरूरी है कि स्त्री अपनी शक्ति को पहचाने।
 जरूरी है कि स्त्रियाँ अब इस कठघरे से बाहर निकलकर समाज का सूत्र खुद सम्भालना सीखें...सशक्त बनें...और संतान का पालन निष्पक्ष होकर करें क्योंकि वे अपनी संतानों को ही नहीं भावी समय का भविष्य तैयार कर रही हैं।

नोट - इस आलेख के लिए सन्दर्भ इंटरनेट पर उपलब्ध विभिन्न आलेखों से लिए गए हैं और मैं आभारी हूँ। सन्दर्भों का उल्लेख भी अब किया जाएगा।

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