इस बार रक्षाबंधन पर खुद को भावुकता के भ्रमजाल से निकालिए

महिलाओं ने सोशल मीडिया पर रायता फैला दिया है । कल तक जो ताने,उलाहने, तंज और कटुक्तियां अप्रत्यक्ष रूप से निकलती थीं, आज सोशल मीडिया पर कैमरे के सामने निकल रही हैं । घर, ससुराल, देवर, भौजाई, ननद और रिश्तेदारों को कोसने वाले मीम वायरल हो रहे हैं । रील के जवाब में रील बन रही है...लोग तमाशा देख रहे हैं और तमाशे से कमाई हो रही है । देखा जाए तो कोई किसी से कम नहीं है । ननदें भौजाइयों पर मायका छीन लेने का आरोप लगा रही हैं तो भौजाइयां ननदों को आफत मान रही हैं । कंटेंट के नाम पर हर दूसरी रील में बार - बार कचरा परोसा जा रहा है । इधर रक्षाबंधन आ रहा है तो कई किसिम की बहनें आपको देखने को मिल जाएंगी । किसी को गरीब भाई को राखी नहीं बांधनी और अमीर भाई को राखी बांधनी है । भाई - बहन के झगड़ों से सजे एआई वीडियो हर जगह फैले हुए हैं । विज्ञापनों के युग में संबंध भी अब विज्ञापन और कंटेंट बनकर रह गये हैं । भौजाइयां अपने घर को अपना साम्राज्य मान रही हैं और देवर, ननद या किसी और का दखल उनके लिए आक्रमण की तरह है । इसे रोकने के लिए वह किसी भी तरह का प्रपंच रचने से बाज नहीं आ रही हैं और यही हाल ननदों का भी है । बहनों का भावुक होना उनकी सबसे बड़ी समस्या है और किसी पर भावनात्मक रूप से निर्भर होकर उम्मीद बांध लेना रुलाता है । परदे पर बहनों को नायक की छवि मजबूत करने के लिए टूल बनाया जा चुका है मगर उसके हिस्से के अधिकार लिखे नहीं गये और आज जब कानून उसे कुछ देना चाहता है तो बहनों को माताओं के जरिए वंचित किया जा रहा है । दलील यह है कि वह तो सब कुछ शादी में ले जा चुकी इसलिए उसका हक नहीं बनता । एक ही घर में रहकर भाई - बहनों की जीवनशैली में जमीन - आसमान का अंतर हो सकता है । भौजाइयों की असुरक्षा उनसे कांड करवाती है । वह अपनी ननदों को पराया और अवांछित महसूस करवाने का एक मौका नहीं छोड़तीं और उनको यह उम्मीद है कि ननदें उनको सम्मान दें और समाज में अच्छी बहू की छवि को वह चमका सकें । उनको ननद या देवर नहीं गूंगे प्राणी चाहिए जो चाबी भरने पर उनकी हाँ में हाँ मिलाते रहे । भौजाइयों के पक्षपात को देवाज्ञा समझकर उसे स्वीकार कर ले और परिवार की शांति के नाम पर माताओं ने अपनी बहुओं को यह छूट दे रखी है । अगर रक्षाबंधन जैसे त्योहार न होते तो मुझे लगता है कि बहनों को मायके में रहने का मौका भी नहीं मिलता । भाइयों ने अक्सर तमाशा देखा है और कई बार अपने परिवार परिसीमन प्रक्रिया में बहनों को बाहर कर रखा है । ननद चाहे उम्र में बेटी की उमर की हो मगर भौजाइयों की प्रतियोगिता जारी रहती है । भौजाइयों को लगता है कि ननदों को घर में रहने देना उन पर अहसान करना है...उसे बस पड़ी रहना चाहिए । अभी बहुत सी दहेज हत्याएं हुईे और हो रही हैं । सब ज्ञान बांट रहे हैं कि लड़कियों को मायके लौट आना चाहिए ...पिता उसे घर ले आएं और माता उसका ध्यान रखे ...मगर यह बहुत अव्यावहारिक है । जब तक माता - पिता हैं, बेटी घर में रह भी ले मगर उसके बाद क्या होगा......भाई उस पर तंज कसेंगे और हर रोज उसे बोझ बताकर आत्मविश्वास कतरते रहेंगे और उस पर अगर वह विवाहित हुआ तो उस बेटी की भौजाई उसे इतना प्रताड़ित करेगी, मानसिक रूप से इतना परेशान करेगी कि वह लड़की मानसिक रोगी बन जाएगी या फिर नौकरों से भी बदतर जीवन जीएगी । आप स्त्री हों या पुरुष हों, किसी पर पूरी तरह निर्भर होंगे तो वह आपको जरखरीद नौकर ही समझेगा इसलिए यह कहना बंद कीजिए कि मायका स्त्री की शरणस्थली बन सकता है । एक ही घर में रहते हुए वह लड़की रसोई में नहीं जा सकेगी....उसे अधिकार नहीं होगा कि वह खुलकर सांस ले सके । एक ही रसोई में अलग - अलग पकवान बनेंगे और उसके हिस्से में खाने के साथ एक दिन पुरानी सब्जी भी होगी या फिर कुछ खास बना हो तो वह घर के बच्चों या पति के लिए रख लिया जाएगा । उस घर के बच्चे उसे देखकर आगे बढ़ जाएंगे और उसे अलग - थलग रहना होगा...आखिर क्यों ऐसी जिन्दगी बितानी चाहिए किसी को भी । माता - पिता नहीं रहे तो कोई पूछने वाला नहीं और अगर रहे तो अपनी आंखों के सामने अपनी बच्ची की हालत देखकर रोज मरेंगे । लोग आएंगे...तमाशा देखेंगे....और चल देंगे । कितनी अजीब बात है..जिस घर में स्त्री जन्म लेती है, बड़ी होती है...उसी घर में अछूत बना दिया जाना समाज की दृष्टि में न्यायसंगत है और यही सामाजिकता है । क्या इससे बड़ी विडम्बना है कहीं...? हमारे यहां त्योहार भी समाज का चेहरा देखकर मनाए जाते हैं । वह स्टेटस सिम्बल है । बहनों की राखी में सामाजिकता का भाव बस चुका है । आओ..राखी बांधो और उपहार या नकद लेकर चलती बनो । आप इसे प्यार कहते हैं...जहां संबंधों के नाम पर औपचारिकता ही बची रही है । एक ही घर में जन्म लेने पर भी बहनों के हिस्से में पीजी और होटल ही रह जाते हैं और यह भी सामान्य है । आखिर कब तक झूठ बोलते रहेंगे लड़कियों को...उनको सच का सामना करना सिखाइए । समय आ गया है कि लड़कियां संबंधों की भूल -भूलैया से बाहर निकलकर अपनी जमीन तैयार करना सीखें । इज्जत के नाम पर अनचाही शादी लड़कियों का भाग्य बना दिया जाता है, उससे समझौतों की उम्मीद की जाती है और यह भी कि वह अधिकारों और सम्पत्ति के हक की बात न करे । यह भी सच है कि अपनी उम्मीदें खुद से ऱखना ही समझदारी है । अपनी इच्छाओं के लिए किसी पर भी निर्भर क्यों रहना है और क्यों भाई को एटीएम समझना है । जरूरत से ज्यादा अधिकार जताना अपना सम्मान कम करता है फिर चाहे जितना भी बुरा लगे । मत मांगिए न साड़ी और महंगे तोहफे । जहां आपका कोई अधिकार ही नहीं , वहाँ किसी से कोई उम्मीद और संबंध की ख्वाहिश क्यों ? क्या यह बेहतर नहीं होगा कि अब बहनों को झूठा दिलासा देना बंद कर देना चाहिए कि हर मुश्किल घड़ी में वह मायके पर निर्भर रह सकती है । लड़कियां कब तक दूसरों के भरोसे अपनी जमीन खोजती रहेंगी और उनको क्यों नहीं अपने लिए आवाज उठानी चाहिए ? अब यह मान लीजिए कि पक्षपात होता है और यह इसलिए होता है क्योंकि चीजें आपके हाथ में नहीं हैं । आपकी जिम्मेदारियां आपका फर्ज हैं मगर कोई आपके लिए करे तो वह अहसान कर रहा है । समाज को हिप्पोक्रेसी की आदत लग चुकी है । इस बार रक्षाबंधन पर बस की मुफ्त टिकटों से आगे बढ़िए, इस बार औपचारिकता निभाने के लिए दिये गये उपहारों को खारिज करना सीखिए । ऐसी कोई चीज मत मांगिए जिसकी कीमत आपका आत्मसम्मान है । फरममाइश मत कीजिए बल्कि जो खाने या पहनने का मन हो, खुद खरीद लीजिए । अपने काम खुद कीजिए और अपनी जिन्दगी से ऐसे रिश्तों को जितना दूर रख सकती हैं, रखिए । जहां अपनापन नहीं है, वहां अपनापन जताना पानी पर लकीर खींचना है...जिसका कोई फायदा नहीं है । जरूरी नहीं कि आप सबको साथ लेकर चलेंगी तो दुनिया भी आपको साथ लेकर चलेगी । जो आपका नहीं है, वह आपका नहीं है...एक बात यह समझ में आ गयी कि अपना वही होता है जो हम अर्जित करते हैं । हम चाहें जितनी भी बड़ी बातें करें मगर परिवारों में साम्राज्यवादी मानसिकता की दीमक लग चुकी है । अगर लोग बदले हैं तो खुद को बदलकर शांति से दूरी बना लेना ही समझदारी है ।

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