अगर गृहिणियों से घर है तो उजियारे पर पहला हक भी उसे दीजिए



एक औरत की पहचान क्या हो सकती है भारत में...एक गृहिणी...एक पत्नी...एक बहू...एक माँ....इसके आगे...इस देश में बात करने से कतरा रहे हैं। अर्थशास्त्री भले ही मानते रहे हों कि देश की अर्थव्यवस्था में गृहिणियों का योगदान है मगर हमारी पितृसत्तात्मक सोच आज भी यह सोचकर ही घबरा जाती है कि महिलाएँ अगर काम करेंगी तो घर कौन सम्भालेगा? भारत बदल रहा है मगर हमारी परम्परा की रक्षा में जुटे पुरुषों को अब भी ये सोचना नागवार गुजरता है कि महिलाएँ अपने बारे में सोचें...अपने हिस्से की प्रतिभा का उपयोग करें। हर काम पैसे के लिए नहीं होता...कुछ काम अपनी संतुष्टि के लिए होते हैं मगर अपनी अस्मिता के बारे में महिलाएँ सोचें...ये आज भी हमारा समाज नहीं चाहता और न ही महिलाओं को इस बाबत सोचने दिया जा रहा है। इस सोच का सीधा सम्बन्ध अपनी सुविधा भरी उस सोच से है....जो आज भी नहीं स्वीकार करना चाहती कि महिलाओं की दुनिया उनकी गृहस्थी के आगे है। वे अपनी गृहस्थी को बरकरार रखकर भी अपनी जगह बना सकती हैं। हमारी सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि महिलाओं को देवी बनाकर उनको ऐसी जगह पर जबरन बैठा देना चाहते हैं जहाँ हम उसके हिस्से की खुशियाँ, उसके फैसले खुद तय करने लगते हैं और ये मान लेते हैं...ये उस महिला का फैसला है जो नहीं होता..ये असुरक्षा है...सुविधाएँ छिन जाने का डर है और ऐसे पुरुषों को हर नौकरीपेशा लड़की में होम ब्रेकर दिखायी पड़ती है क्योंकि न तो वे बदलते समय के अनुसार खुद को बदलने के लिए तैयार हैं और न ही अपनी सुविधाओं से समझौता करने को तैयार हैं..ऐसे में महिलाओं का घर में योगदान....उनका महिमा मंडन उनकी ढाल बनता है और वे खोखले तर्कों से उसे रोकने की कोशिश करते हैं। एक बात तो तय है कि अगर कोई औरत अपनी प्रतिभा को सामने लाती है तो उसका आत्मविश्वास बढ़ेगा....अगर आर्थिक तौर पर पर सक्षम होती है तो उसका आर्थिक योगदान भी घर के साथ देश को मिलेगा...देश के विकास में उनका योगदान और अधिक होगा। एक गृहिणी अपनी छोटी – छोटी जरूरतों के लिए आप पर निर्भर रहे और आपसे हमेशा पैसे माँगती रहे और हर शाम को फोन करके पूछे कि आज रात को क्या बनेगा, इससे पुरुषों के अहं को संतुष्टि मिलती है, ये सच है और आप यह सिलसिला टूटने नहीं देना चाहते। आप इस सोच से ही घबराते हैं कि आपके घर की औरत..अब आप पर आर्थिक तौर पर निर्भर नहीं रहेगी और हर छोटी बात के लिए आपका चेहरा नहीं देखेगी...महत्व खत्म हो जाने का यह डर ही है कि आज भी गृहिणियों को आर्थिक तौर पर प्रोत्साहन हमारा समाज नहीं देना चाहता। गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान की सशक्त अर्थव्यवस्था के पीछे वहाँ की महिलाओं का बड़ा योगदान है मगर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में अब भी यह हिचक है। निर्णय लेने में भागीदारी में आर्थिक पक्ष एक बड़ा महत्व रखता है और अगर न भी हो तो अपनी कला से या अपनी प्रतिभा को आगे बढ़ाकर जो आत्मिक प्रसन्नता मिलती है...उसका कोई मुकाबला ही नहीं है..यह एक आम सी औरत में आत्मविश्वास भरता है और उसके चेहरे पर मुस्कान लाता है...क्या यह मुस्कान छीनने का हक आपको है? इस बात को लेकर अक्सर बहस होती है मगर इस बात को बढ़ने ही नहीं दिया जाता। यह एक औरत की मर्जी है कि वह तय करे कि उसे क्या पसन्द है, वह क्या करना चाहती है...ये तय करने वाले आप कौन हैं...आप चाहते ही नहीं है कि वह कभी इस बारे में सोचे...आपको आदत हो गयी है कि आप उसे अपने अधीन सिर झुकाए हुए देखें। आज भी अधिकतर घरों के आर्थिक फैसलों में महिलाएँ शामिल नहीं हैं और न ही आप उसे शामिल करना चाहते हैं और सँयुक्त परिवारों में तो यह और ज्यादा होता है। मैंने देखा है कि कि पति के जाने के बाद एक औरत किस तरह अपने जेठ या देवर पर निर्भर होती है और उनके साथ किस तरह का व्यवहार होता है...ऐसे मामलों में यह भी हुआ है कि उस महिला के पास हुनर था और वह उसके जरिए अपनी दुनिया को खुशहाल बना सकती थी मगर परिवार और समाज के दबाव में वह ऐसा कर नहीं सकी और उसके घर की पुरुष और सम्मिलित स्त्री सत्ता ने अपने हिसाब से उसके हिस्से के फैसले लिए। आखिर क्यों अपनी छोटी – छोटी खुशियों के लिए गृहिणियों को सालों इंतजार करना चाहिए...हाल ही में करीना कपूर और अर्जुन कपूर की एक फिल्म आयी थी जिसमें अर्जुन हाउस हसबेंड बने थे मगर यहाँ तो हाउस हसबेंड की बात ही नहीं है...बस जरा से लचीलेपन की जरूरत है...क्या हम घर की देवियों के लिए इतना भी नहीं कर सकते...मान लीजिए हम स्वार्थी हैं तो क्या महिलाओं को इस बारे में नहीं सोचना चाहिए। आखिर वे क्यों नहीं अपने घर के आर्थिक मसलों में भागीदारी कर सकतीं और आपको उसका साथ लेने में हिचक क्यों है। क्यों नहीं आप उसके हिस्से की एक राशि उसके नाम करते और बगैर किसी सवाल के...क्योंकि यह उसका अधिकार है...और आप उससे हिसाब नहीं माँगेंगे क्योंकि ये घर आपकी तरह उसका भी है। ये त्याग का ठेका हमेशा घर की माँ, बहन, बेटी या पत्नी क्यों ले और हमारी संस्कृति इतनी ही महान है तो वह उसे दबाने और अन्धेरे में रखने के पक्ष में क्यों है? हर छोटी बात पर उसे क्यों सुनना चाहिए कि कमाओगी तो पता चलेगा? महिलाएं ज्यादा अच्छी हैं, सहनशील हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि आप उनकी इस खूबी को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करें क्योंकि उनमें रचनात्मकता और प्रतिभा नाम की चीज भी है और उसे सामने लाना भी आपकी जिम्मेदारी है...अगर वाकई आप उसे अपने घर का हिस्सा समझते हैं....वरना आपकी ये गोल –गोल बातें आपका खोखलापन भर ही दिखाएंगी....अगर गृहिणियों का योगदान घर बनाने में सबसे ज्यादा है तो भोर की पहली किरण भी उसके नाम ही होनी चाहिए। 

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