तीन तलाक : उतरते सियासत और मजहबी नकाबों के बीच सुबह का इंतजार




कुछ घटनाएँ इतिहास बदलने के लिए ही होती हैं और बदलाव इतना आसान नहीं है, कम से कम तीन तलाक  के मामले को देखकर तो यह कहा जा सकता है। देखा जाए तो यह मसला समानता और सम्मान से जुड़ा है मगर राजनीति भी इस मसले को हथियाने में लग गयी है। तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित कर दिया है मगर 6 दिनों तक जो सुनवाई चली, उसमें एक – एक करके नकाब उतरते दिख रहे हैं। हैरत तब होती है जब कपिल सिब्बल जैसा कद्दावर अधिवक्ता अपने प्रोफेशन का हवाला देकर एक घिनौनी प्रथा को आस्था का मामला बताता है। सिब्बल जब कहते हैं कि तलाक राम जन्मभूमि की तरह आस्था का मामला है तो शक होने लगता है कि क्या वे वाकई सुशिक्षित हैं या जनप्रतिनिधि होने के लायक हैं। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की पैरवी कर रहे सिब्बल कहते हैं कि समानता का नियम तीन तलाक पर लागू नहीं होता तो समझ आ जाता है कि वोट बैंक की राजनीति के कारण हमारे जनप्रतिनिधि किस हद तक  गिर सकते हैं। ये भी आश्चर्य की बात थी कि सुप्रीम कोर्ट ने भी यह कहा कि अगर तीन तलाक धर्म का मामला हुआ तो वह दखल नहीं देगा। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या धर्म के नाम पर सातों खून माफ करने की परम्परा चलती रहनी चाहिए क्योंकि अगर ऐसा होता तो हिन्दू समाज में बाल –विवाह, सती प्रथा और दहेज जैसी कुप्रथाओं पर लगाम कभी नहीं कसी जाती। दरअसल, तीन तलाक आस्था से अधिक मुस्लिम महिलाओं के आत्मसम्मान और समानता के साथ जीने का मामला है और यह वह अधिकार है जो इन महिलाओं को बहुत पहले मिल जाता, अगर राजीव गाँधी की सरकार ने शाहबानो के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटा न होता। तीन तलाक सीधे मुस्लिम कट्टरपंथियों और समुदाय से जुड़ा मसला है और वोटबैंक की राजनीति सीधे इस मामले से जुड़ती है इसलिए कोई भी राजनीतिक पार्टी इस पर मुँह नहीं खोलना चाहती। धर्मनिरपेक्षता और मानवाधिकार से लेकर सशक्तीकरण के नाम पर वोट बटोरने वाले नेताओं के मुँह पर ताला पड़ गया है और विडम्बना यह है कि इसमें महिलाएँ भी शामिल हैं। ममता बनर्जी से लेकर सो निया गाँधी और मायावती तक ने अभी तक इस मामले में मुँह नहीं खोला है जबकि वे खुद महिलाएँ हैं। औरतों की जिन्दगी को जहन्नुम बनाने वाले तीन तलाक के कारण महिलाओं की जिन्दगी नर्क ही नहीं बनती बल्कि इस प्रक्रिया में उनकी अस्मिता को लगातार  कुचला जा रहा है। आखिर यह कैसा समाज है जो अदालत में तीन तलाक को पाप कहता है और फिर इसे वैध भी ठहराता है। धर्म और आस्था क्या अन्य़ाय और अनाचार का पूरक बन गए हैं, अगर नहीं तो निकाह के शर्तनामे में महिलाओं के हक में एक और नियम लागू करने में परेशानी कहाँ है? आखिर तीन तलाक को जायज ठहराने के लिए दलीलें देने वाले ये क्यों कहते हैं इससे असहजता होगी? जब आप इस देश की तमाम सुविधाएँ लेने के लिए हमारे संविधान का सहारा लेते हैं तो उसके नियम मानने में आपको क्यों तकलीफ हो रही है? अगर तकलीफ हो ही रही है और मजहब के नाम पर मनमानी ही आपकी मर्जी है तो आपको किसी प्रकार के अधिकार क्यों मिलने चाहिए? दुनिया के 25 इस्लामिक देशों में तीन तलाक पर जब प्रतिबन्ध है और वहाँ इस्लाम को लेकर परेशानी नहीं है तो आप इतने खास क्यों माने जाने चाहिए के तमाम देश एक अलग कानून और बंधनों के अनुसार चले और आपका अधिकार क्षेत्र बिलकुल अलग है। सच तो यह है कि मजहबी कट्टरपंथी औरतों की तरक्की से बुरी तरह घबराए हुए हैं, यह उनके लिए औरतों को अपनी सल्तनत समझने का मामला अधिक है क्योंकि जो लोग औरतों को गुलाम समझते हैं, उनके लिए औरतों की समानता के अधिकार को मान्यता देना उनकी सबसे बड़ी हार होगी। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भी माना कि विवाह विच्छेद के लिए तीन तलाक सबसे खराब तरीका है जो वांछनीय नहीं है। तीन तलाक के विरोध में लड़ रहे अधिवक्ता राम जेठमलानी ने कहा कि तीन तलाक लैंगिक आधार पर भेदभाव करता है और यह तरीका पवित्र कुरान के सिद्धांतों के भी खिलाफ है और इसके पक्ष में कितनी भी वकालत इस पापी और असंगत परपंरा को, जो संविधान के प्रावधानों के खिलाफ है, बचा नहीं सकती है।’’ उन्होंने कहा कि कोई भी कानून एक पत्नी को पति की मर्जी पर पूर्व पत्नी बनने की इजाजत नहीं दे सकता और यह घोर असंवैधानिक आचरण है। केंद्र ने न्यायालय से कहा था कि अगर सुप्रीम कोर्ट तीन तलाक को अवैध एवं असंवैधानिक करार देता है तो सरकार मुसलमानों में विवाह और तलाक के नियमन के लिए विधेयक लेकर आएगी। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को यह साफ कर दिया था कि वह समय की कमी की वजह से सिर्फ तीन तलाकपर सुनवाई करेगा। हालांकि कोर्ट केन्द्र के जोर के मद्देनजर बहुविवाह और निकाह हलालाके मुद्दों को भविष्य में सुनवाई के लिए खुला रख रहा है

बेंच में चीफ जस्टिस जेएस खेहर, जस्टिस कुरियन जोसेफ, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस अब्दुल नजीर शामिल हैं। इस बेंच की खासियत यह है कि इसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और पारसी धर्म को मानने वाले जज शामिल हैं। इस मसले का जल्द निपटारा करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की गर्मी की छुटि्टयों में भी लगातार सुनवाई हुई।
मामला इस तरह अदालत पहुँचा
- गाजियाबाद के शब्बीर की बेटी को दहेज के लिए ससुरालवालों ने टॉर्चर किया। इसके बाद पति ने तीन बार तलाक बोलकर उससे रिश्ता तोड़ लिया। शब्बीर को लगा कि लोकल एमएलए अतुल गर्ग उसकी मदद कर सकते हैं। शब्बीर उनके पास पहुंचा तो गर्ग ने उसे दामाद के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की सलाह दी।
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न्यूज एजेंसी के मुताबिक, गर्ग ने शब्बीर से कहा कि उनकी बेटी और उसके दो साल के बेटे को सिक्युरिटी भी मिलेगी। गर्ग मंत्री भी हैं। उनके मुताबिक, कोर्ट जाने के अलावा कोई रास्ता भी नहीं था, क्योंकि मुस्लिम पर्सनल लॉ ट्रिपल तलाक को जायज मानता है। इसलिए सरकार तब तक कुछ नहीं कर सकती, जब तक कानून नहीं बदल जाता।
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बहरहाल, शब्बीर और उनकी बेटी के अलावा देश में हजारों ऐसी मुस्लिम महिलाएं हैं, जिनकी जिंदगी तीन बार कहे गए तलाक की वजह से तबाह हो गई। अब उनकी उम्मीद सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी है।
वैसे मामले का एक और पहलू समान नागरिक संहिता से भी जुड़ा है। विधि आयोग को लगता है कि तीन तलाक प्रथा पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला उसे समान नागरिक संहिता पर रिपोर्ट बनाने में भी मदद कर सकता है। सूत्रों के मुताबिक, ‘एक बार इसकी रूपरेखा सामने आ जाए, उसके बाद सभी पक्षकारों से इस मुद्दे पर चर्चा शुरू कर दी जाएगी। एक बात तय है कि तीन तलाक के बहाने इस देश में सियासत और मजहब, दोनों के नकाब उतर चुके हैं। उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट औरतों के हक में फैसला दे और यह फैसला औरतों की जिन्दगी में सुरक्षा, सुकून और समानता दे, ये मुस्लिम समाज के लिए ही नहीं बल्कि सशक्तीकरण के लिए भी एक मुश्किल मगर उम्मीद भरे फैसले की घड़ी है।


(सलाम दुनिया में प्रकाशित आलेख)

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