मी टू का चक्कर बंद कीजिए और नर्क से निकलने का रास्ता दिखाइए



मी टू....पूरा सोशल मीडिया मी टू की चपेट में है...रोज नयी कहानियाँ सामने आ रही हैं..रोज नए खुलासे हो रहे हैं और पीत पत्रकारिता को रोज मसाले मिल रहे हैं...सच है...लगभग हर दूसरी औरत अनचाहे स्पर्श का दंश झेलती है...और महज 2 प्रतिशत या उससे भी कम मामलों में उसे इंसाफ मिल पाता है...मगर मी टू एक बानगी है। जब भी कोई सिने तारिका या अभिनेत्री या ग्लैमर की दुनिया से जुड़ी महिला अपनी किसी तकलीफ को सामने रखती है..खबरें कुछ ऐसी बनती हैं कि उस घटना को रिक्रिएट कर दोबारा सनसनी का मजा लिया जा रहा है। महिलाओं का उत्पीड़न अखबारों और पत्रिकाओं से लेकर मीडिया के बड़े तबके के लिए एक मजा है जिसे वे पाठकों के सामने परोसते हैं...इनर वेयर में हाथ डाला...दबाया..मजे लिए...बस पाठकों के लिए उस घटना को जिन्दा करने का काम कर रहा है...मुझे कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि कोई अखबार इसमें सहानुभूति देखता हो या उस महिला की पीड़ा को महसूस कर रहा हो...कहने की जरूरत नहीं है कि मीडिया में आज भी पुरुषों की प्रधानता है...बहुत से पुरुष ऐसे हैं जो समझते हैं मगर बड़ा तबका ऐसा ही है जो स्कैंडल ढूंढता है..ये दोबारा बलात्कार में धकेलने जैसा है। खबरों के नाम पर निजता का हनन..खबरों की हद कुछ ऐसी कि किसी सिने तारिका के कपड़े खिसकने का इंतजार हो।
एक घटना बताती हूँ...एकता कपूर का कार्यक्रम था...महिला सशक्तिकरण पर बोलना था..उन्होंने बोला भी। जीतेन्द्र और तुषार के बारे में बात की...बाला जी के बारे में बात की मगर उनके कपड़े कुछ ऐसे थे कि उनके पैर कुछ ज्यादा दिख गए। अगले दिन राष्ट्रीय अखबार की सुर्खियों में उनके कपड़े थे..तस्वीरों में झांकते उनके पैर...ये अक्सर होता है...हदें पार कर दीं....बेशर्म हुई...ऐसे पोज दिए...लिपलॉक किया...अंतरंग सीन दिए....और उसके साथ उसकी वही तस्वीर..तस्वीरों में झांकते क्लीवेज....जिसने किया...उसके लिए आम बात है मगर आप तो ढकने की जगह उसे उधाड़ रहे हैं...कभी कभी खबरें पढ़कर लगता है जैसे बॉलीवुड की खबरें या रोजमर्रा की खबरें भी यौन जुगुप्सा को जगाने  या काम कल्पनाओं को तृप्त करने के लिए लिखी जाती हैं। जबरन सेक्स ठूंसा जाता है...आपकी नजर एकता कपूर की बातों तक नहीं जाती...आप मलाइका के संघर्ष को नहीं देखना चाहते क्योंकि आपकी नजर उसके क्लीवेज और नंगे पैरों से आगे कुछ देख ही नहीं पातीं...ये भी उत्पीड़न है और मीडिया और फोटो पत्रकारों की इस नग्नता को झेलना इन महिलाओं की मजबूरी है। हम अक्सर फिल्मों में अंग प्रदर्शन को रोते हैं मगर इनको देखता कौन है....रवीना टंडन, जूही चावला समेत ऐसी बहुत सी अभिनेत्रियाँ हैं जिन्होंने जब तक अंग प्रदर्शन नहीं किया...एक अदद हिट के लिए तरसती रहीं...रवीना को मस्त गर्ल बनना पड़ा तो सलमान खान को भी शर्ट उतारनी पड़ी..और हम शिकायत करते हैं कि फिल्में गंदगी फैला रही हैं...मत देखिए न ऐसी फिल्में....भोजपुरी के साथ भी यही है....चोली...घाघरा...चुम्मा जैसे गीत आप ही हिट करवाते हैं...तो दोष सिर्फ कलाकारों को क्यों...? जब भी बलात्कार जैसी घटनाएं होती हैं...ये हम हैं जो पीड़िता के चरित्र का छीछालेदर करते हैं। मुझे प्रेमरोग फिल्म याद आ रही है जिसमें पद्मिनी कोल्हापुरे के किरदार के साथ बलात्कार होता है तो उस घर की स्त्री उसे मायके भेज देती है क्योंकि सुबह होते ही उसकी पति के आगे जुबान नहीं खुलेगी...माँ उसे रोकती है क्योंकि खून की नदियां बह जाएंगी। ऐसा होता है जब कोई रिश्तेदार और खासा अपना रिश्तेदार घर की बेटी के साथ अश्लील हरकत करता है...अंगों को दबाता है और जब बेटी बोलना चाहती है तो उसकी बात पर कोई विश्वास नहीं करता...लोग उसे और उसके चरित्र पर उंगली उठाते हैं....माएं बेटियों से ज्यादा अपने उस भाई को अपना समझती हैं और उस अपराधी का घर में आना जाना बदस्तूर जारी रहता है...कल्पना कीजिए कि वह लड़की किस हाल में जी रही होगी...क्या यह उसके लिए रोज रोज की मौत जैसा नहीं है? मुझे बताइए कि ऐसे मामलों में मी टू अभियान क्या करेगा और वह लड़की खासकर किसी छोटे शहर में या गांव में हैं तो उसके सामने कौन सा रास्ता बचा है। किसी दफ्तर में जब वह काम करती है और उसके सिर पर काम करने का जुनून है...घर का विरोध झेल कर आगे बढ़ रही है और बराबर काम करना चाहती है...तो उसे उसके दफ्तर में अजीब सी नजर से देखा जाता है और उसको बॉस की गर्लफ्रेंड बना दिया जाता है..क्या यह उत्पीड़न नहीं है और ये सार्वजनिक उत्पीड़न सजा का हकदार क्यों नहीं है? आशीर्वाद के बहाने कार्यालयों में जब किसी लड़की या लड़के के निजी जीवन पर उंगली उठे और अधिकारियों के हाथ जब देह पर फिसलते रहें...ये सब जानकर भी पूरा कार्यालय डर से खामोश रहे..उस अधिकारी की तरक्की हो और शिकायत करने पर उस महिला को ही काम से निकाला जाए तो इस अन्याय को देखकर खामोश रहने वाले दोषी क्यों नहीं हैं और वहाँ मी टू कैसे काम करेगा? ऐसे मामले या तो दबा दिए जाते हैं या फिर इसे घर उजाड़ने की कोशिश माना जाता है...इस सोच को हटाने में मी टू कैसे काम करेगा? हमारा संविधान समानता का अधिकार देता है मगर समानता छोड़िए...जरा सा सम्मान भी बचा है कार्यस्थलों में? इस देश में पति के लिए वेश्या का प्रबंध करने वाली पत्नी को आदर्श माना जाता है और शास्त्र  पत्नी को बिस्तर पर वेश्या बनने की सलाह देते हैं...वहां ये मी टू क्या करेगा...जहाँ पत्नी को न कहने का अधिकार देने में भी आपकी सरकार और आपकी न्यायपालिका हिचक रही है। क्या पत्नियों को मी टू का अधिकार है या उस वेश्या के लिए भी मी टू का अधिकार है...। उत्पीड़न तो पुरुषों का भी होता है और बहुत से पुरुषों ने इसका शिकार होकर बात नहीं रखी...क्या उनके अधिकार भी सुरक्षित हैं..क्या पतियों को मी टू का अधिकार है? वह बच्चे कैसे मी टू कहें जिनकी पहुँच सोशल मीडिया तक नहीं है मगर हर रोज कोई अंकल या आंटी तक उनके साथ गंदा काम करते हैं। रास्ते पर कोई लड़की चल रही है...पीछे से एक हाथ अचानक उसके सीने को दबाकर चला जाता है और घर जाने पर उसे बताया जाता है कि वह  सड़क पर चलना नहीं जानती। बसों में नजरें पूरी देह का एक्सरे कर देती हैं और विरोध करने या साथ देने कोई नहीं आता। किसी के चेहरे पर तेजाब फेंका जाता है और लोग वीडियो बनाते हैं...ऐसे समाज में मी टू पता नहीं क्यों...बस एक मजाक लगता है...किसी का कुछ भी बिगड़ने वाला नहीं है....यह सच है...भयावह सच है। सही है कि महिलाएं बात रख रही हैं..जो शिक्षित हैं..उन्होंने अपने अधिकारों को पहचानना शुरू कर दिया है.....जो कभी नहीं कहा...अब कह रही हैं...मगर इस साहस के पीछे बहुत कुछ ऐसा है जो अंधेरे में डूबा है...गांवों में..घरों में...दुकानों में बहुत सी ऐसी आवाजें हैं जो खामोश रहेंगी क्योंकि आपके मापदंड कुछ ऐसे हैं कि आप अपराधियों को शहंशाह बनाकर पूजते हैं...उनसे डरते हैं....क्या होगा ऐसे मी टू का...क्या यह अच्छा नहीं कि इन स्थितियों से निकलने का तरीका आप बताएं...हां उत्पीड़न हुआ...कैसे निकला जाए उस नर्क से....ये बताना कहीं ज्यादा जरूरी है और उससे भी ज्यादा उन औरतों का साथ आना जरूरी है जो बेटी के उत्पीड़न को परिवार और रिश्तों के नाम पर स्वीकार कर लेती हैं...उस सास को बहू के साथ खड़ा होना होगा जिसके साथ उसका बेटा शादी के नाम पर बलात्कार करता है...उस समूचे कार्यालय को उस लड़की के साथ खड़ा होना होगा जिसका बॉस रोज उसे अनचाहे स्पर्श का दंश देता है और उसे नीचा दिखाता है...ऐसा होना कठिन है तो अब यह मी टू का चक्कर बंद कीजिए और नर्क से निकलने का रास्ता दिखाइए।


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आखिर हम महिला मीडियाकर्मियों से आपको इतना भय क्यों है साहब?

रेखा : आँधियों को आँखों की मस्ती से मात देती शम्मे फरोजा

वह उपेक्षित, प्रताड़ित स्त्री....मेरी माँ है