श्रीमान भंसाली....औरतें जीना चाहती हैं....देह और पुरुष उनकी अंतिम नियति नहीं है



पद्मावत पर पहले भी लिख चुकी हूँ। संजय लीला भंसाली की अभिव्यक्ति के अधिकार को हमारा समर्थन भी है मगर बात अब उनकी फिल्मों से कथित रूप से सशक्त स्त्री की परिभाषा को लेकर भी है और इसकी जद में पूरा हिन्दी सिनेमा आ जाता है। यौन स्वतंत्रता के नाम नाभि से लेकर न्यूड दिखाने वाले हिन्दी सिनेमा को जीती जागती और सोचने वाली औरतें रास नहीं आतीं। वह गोल – मोल मुहावरों से खेलता है और हमेशा से उसकी स्वतंत्रता को उसकी देह मुक्ति के आवरण में लपेटकर शोषित करता आया है। राज कपूर ने भी यही किया...सशक्तीकरण की आड़ में अपनी नायिकाओं से जमकर अंग प्रदर्शन करवाया....कैमरे औरतों की देह की बारीकियाँ अधिक झाँकते हैं और जब औरतें दिमाग की बात करती हैं तो उनका मान आहत हो जाता है...वह चाहते ही नहीं कि स्त्रियाँ अपने सीमित दायरे को तोड़कर बाहर निकले। दक्षिण भारत की डब फिल्मों के तो क्या कहने...सशक्त स्त्री तलवार उठाती भी है, चलाती भी है मगर अंततः वह एक अच्छी स्त्री है और अगर वह नहीं भी है तो उसे उसे बताया जाता है कि वह औरत जात है (लाडला फिल्म में अनिल कपूर को याद कीजिए), श्रीदेवी बॉस रहती है मगर अंत में वह अपनी औकात पर आ ही जाती है। औरतों को बार – बार याद दिलाया जाता है कि उनकी जगह क्या है, उसे भूलना नहीं चाहिए और इस सोच को बढ़ावा देने में हमारी नायिकाओं का अतुलनीय योगदान है। परदे पर गजरा, चोटी और बनारसी साड़ी पहने इन औरतों की निजी जिन्दगी में इनसे दूर तक कोई रिश्ता नहीं होता। ये नायिकायें परदे पर जो करती हैं, वह अपनी निजी जीवन में नहीं करना चाहेंगी। हमारे फिल्मकार जानबूझकर ऐसी कहानियाँ सामने लाते हैं जिनमें स्त्री सशक्तीकरण की आड़ में उन पितृसत्तात्मक मूल्यों को ही मजबूत बनाने की कोशिश की जाती है जिनको अब हम छोड़ देना चाहते हैं। ऐसी नायिकाओं का महिमामंडन होता है, ऐसी कहानियाँ सामने लायी जाती हैं, जिनसे बार – बार यह सिद्ध करने की कोशिश की जाती है कि पुरुष के बगैर स्त्री का अस्तित्व कोई अस्तित्व नहीं है और पति के मरने के बाद या बलात्कार के बाद उसको जीने का अधिकार नहीं है...पति का साथ देने के लिए आग में कूदकर जान देती औरतों में आपको वीरता नजर आ सकती है, हमारे लिये वह मजबूरी में की गयी वीभत्स सामूहिक आत्महत्या है। श्रीमान भंसाली का एक डिस्क्लेमर उनके इस गुनाह को दूर नहीं करता। जो लोग उनको स्त्री के अधिकारों का पैरोकार मानते हैं, वह एक बड़ी गलती कर रहे हैं.....भंसाली समेत अन्य फिल्मकार इसी सिद्धांतों पर चलते चले आ रहे हैं। संघर्ष करती, अपने अधिकारों की बात करने वाली और जीने वाली स्त्री की कहानियाँ हमारे इतिहास में भरी पड़ी हैं और जिस पृष्ठभूमि पर आपने पूरी कहानी ली है....वहाँ भी ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं....जिन्होंने परिवर्तन के लिए अपनी पूरी जान लगा दी मगर बॉलीवुड को ऐसा कुछ दिखता ही नहीं है। आपको पन्ना धाय नहीं दिखती जिसने अपने बेटे की बलि देकर राजपूताना को अंत से बचाया। आपको शिवाजी पर फिल्म बना सकते हैं मगर आप जीजाबाई को केन्द्र में रखकर कहानी नहीं कह सकते। आप सावित्री बाई फुले पर फिल्म नहीं बना सकते। आप सिस्टर निवेदिता, मैडम भीखा जी कामा, मातांगिनी हाजरा पर फिल्म नहीं बना सकते क्योंकि आपको इनमें कोई नायकय़त्व नहीं दिखता। आप बाजीराव पेशवा की कहानी चुनते हैं और तत्कालीन समय का हवाला देकर उनकी बेवफाई को भी महिमामंडित कर सकते हैं और उनकी प्रेमिका मस्तानी आपकी नायिका बनती है मगर इन दोनों के बाद जिस काशीबाई ने पेशवा शासन को सुरक्षित रखने की जद्दोजहद की, वह आपकी कहानी में हाशिये पर चला जाता है। दोनों ही स्थितियों में घुटन स्त्री की ही है। पदमावती का जौहर उस युग का क्रूर सत्य हो सकता है मगर आज के दौर में उसे सामने लाने का क्या औचित्य है? 14वीं रानी के लिए अपनी 13 पत्नियों को ताक पर रखने वाले रावल रतन सिंह क्या आज आदर्श बन सकेंगे? जौहर में अपनी ताकत देखने वाली दीपिका क्या लपटों की आँच के बीच चीखों को सुन सकती हैं। अगर आग में जल मरना ही आदर्श है तो इससे बुरा कुछ नहीं हो सकता। पद्मावती एक महारानी थी....प्यार क्या आग में कूद मरने का नाम है...क्या बलात्कार के बाद जीने का अधिकार स्त्री से छीन लिया जाना चाहिए। अगर हाँ, तब तो द्रोपदी को भी जीने का अधिकार नहीं था.....पूरी सभा के सामने उनका चीरहरण हुआ था....मगर द्रोपदी जीवित रहीं और धर्मयुद्ध हुआ....। आदर्श इसे कहा जा सकता है। स्वरा ने एक जरूरी प्रश्न उठाया है और उनके हवाले से ही याद कीजिये कि जौहर के दृश्य में एक बच्ची और गर्भवती है.....भंसाली इससे क्या संदेश देना चाहते हैं....? जो लोग पद्मावती और चन्द्रशेखर आजाद की तुलना कर रहे हैं, उनको याद रखना चाहिए कि चन्द्रशेखर आज अंतिम साँस तक लड़े थे......उसके बाद उन्होंने अंतिम गोली खुद को मारी....उनकी तो कोई तुलना ही नहीं की जा सकती। पद्मावत जैसी ही स्थिति मिर्च – मसाला फिल्म में है.....वहाँ....साधारण स्त्रियाँ हैं....और उनका जीवट देखिये..। 

दीपिका की दलील है कि पद्मावती ने अपने पति का साथ देने के लिए जौहर चुना...पर क्या पद्मावती साधारण स्त्री थीं....या एक महारानी थी और रावल के न रहने पर किले की रक्षा का भार उन पर था.....मगर इस कहानी में जौहर वीरता नहीं विवशता बनकर आता है...वह एक घटना थी....जो हो चुकी है। ये विचित्र है कि तमाम सुविधायें, स्वतंत्रता और सुख भोगने वाली अभिनेत्रियाँ उन सभी रूढ़ियों के साथ हैं....जिनमें शायद वे कभी नहीं फँसना चाहेंगी...और न ही उनको हकीकत का अंदाजा है...दीपिका को भी नहीं है...आखिर ये दोहरापन किसलिए? आज बहुत से जीवट किरदार हैं जिनको सामने लाये जाने की जरूरत है....भंसाली जी हो सके तो उस पर काम कीजिये.....और स्वीकार कीजिये कि पुरुषों के बगैर भी स्त्रियों का एक अस्तित्व है और उसका सम्मान आपको भी करना चाहिए।

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