मैं का होना इतना खराब नहीं.इतना बुरा नहीं खुद से प्रेम होना



कोई भला अपने लिए क्यों लिखता है? क्या अपने लिए लिखना अहंकार है या उस स्पेस की तलाश, जो आपको जिंदगी नहीं देती...वो लोग नहीं देते...वो समाज नहीं देता...वो रिश्ते नहीं देते...जो आपकी जरूरत है। इस दुनिया में प्यार की कमी नहीं है बस वह मिलता तब है जब आप पानी की तरह ढल जाते हैं...बगैर अपनी इच्छाओं, सपनों और व्यक्तित्व का खयाल किये..। बहुत आदर भी मिलता है जब आप दूसरों के सम्मान और तथाकथित इज्जत और आँकाक्षाओं के लिए अपने सम्मान और इच्छाओं की बलि दें...और पूरा जीवन इस महिमामंडन के साथ गुजार दें...जबकि आपके भीतर त्याग कुंठा बन चुका होता है....और इस पर भी कहा जाता है कि प्रेम, रिश्ते, परिवार, समाज सब नि:स्वार्थ हैं...गलत है...नि:स्वार्थ दुनिया में कुछ नहीं होता...जब आप करेंगे तब आपको मिलता है कुछ और वह भी सशर्त...आपकी मुश्किलों में आप अकेले होते हैं...। परिवार भी प्रेम के आधार पर नहीं समाज की शर्तों के अनुसार चलते हैं और वहाँ संतानों के मोह पर भी समाज और उससे मिलने वाली तथाकथित इज्जत भारी पड़ती है। यकीन न हो तो आँकड़े उठाकर देख लीजिए...क्रूरता की तमाम हदें परिवार ही पार करते हैं...हमारे कोलकाता में तो एक ताजा नमूना सामने आया ही है। ऑनर किलिंग, दहेज हत्या, बाल विवाह ऐसे ही नहीं होते...इनके पीछे एक प्रक्रिया चल रही होती है। प्रेम भी नि:स्वार्थ नहीं होता...पति या पत्नी एक दूसरे की जरूरत को पूरा न करें...तो प्रेम को ढहते देर नहीं लगती। जब आप वर्तमान व्यवस्था से विद्रोह करते हैं तो आप अकेले ही होते हैं...आपको छोड़ दिया जाता है कि अगर आप गिरेंगे तो आपकी अकल ठिकाने आएगी...अगर आप विफल होते हैं तो इस बात का ताना आपको जीवन भर सुनना ही पड़ता है मगर यही लोग आपकी तारीफ करते हैं जब आपको सफलता हाथ लगती है, आप कुछ नया करते हैं और आपको स्वीकृति मिलती है...यह बड़े से बड़े व्यक्ति के साथ हुआ है। कई बार तो स्वीकृति मृत्यु के बाद मिलती है...ऐसी स्थिति में विश्वास और परिवार का विश्वास कहाँ जाता है? दरअसल, हम अपने -आप को छल रहे होते हैं... दिलासा दे रहे होते हैं..मगर सच यह है कि आप कुछ सृजनात्मक करना चाहते हैं तो आपको एकाकी होने से प्यार होना चाहिए....आपको टूटने के लिए तैयार रहना होगा क्योंकि आप भी नयेपन की तलाश में कुछ तोड़ रहे होते हैं....हर प्रक्रिया की प्रतिक्रिया होगी मगर कई बार आपको प्रतिक्रिया इसलिए देनी पड़ती है क्योंकि तब बताना जरूरी होता है कि आपको चोट लगी है और जब तक दर्द का एहसास न हो..परिवर्तन नहीं होते..व्यथा में परिवर्तन के बीज छुपे होते हैं। आपमें कोई उम्मीद नहीं होनी चाहिए...हमारे दुःख इसलिए हैं क्योंकि हम उम्मीदें बाँधते हैं और वह जब पूरी न हो तो हम टूटते भी हैं और तोड़ते भी हैं मगर परिवर्तन की प्रक्रिया का यह अपरिहार्य अंग है...तालाब में कंकड़ मारना सड़ी - गली रूढ़ियों को हटाने के लिए जरूरी होता है जिसे हमने परम्परा का नाम दे दिया है और जो पहला पत्थर मारता है, सबसे ज्यादा चोट उसे ही लगती है। सबसे ज्यादा टूटता भी वही है मगर इसके बाद सामाजिक चेतना का वाहक भी वही बनता है। महाभारत भी इसीलिए हुई क्योंकि रूढ़ियों को परम्परा मान लिया गया था और उसकी बुराईयों को भी नियम.....कृष्ण ने पत्थर मारा...गाँधारी का श्राप झेला मगर आज हमारी चेतना का वाहक उनकी गीता है। मैं प्रभावित हूँ मगर ईश्वरत्व नहीं...एक मनुष्य के तौर पर ही..तत्कालीन बाधाओं के बावजूद आपको उनमें लोकतांत्रिक और उदारता की छवि दिखती है। स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद सरस्वती, राजा राममोहन राय, निराला....गाँधी...जाने कितने लोग पत्थर मारते रहे हैं...तब जाकर आज की दुनिया का यह स्वरूप है। परिवार सिर्फ कुछ सदस्यों का समूह नहीं होता...वह हमारी समूची सृष्टि का समन्वयन है..ऐसा मैं मानती हूँ। जीवन में तोड़ा भी है और टूटी भी हूँ मगर इस प्रक्रिया के दौरान नयी परम्पराओं को आत्मसात करने का संतोष भी है। न मैं वाहक हूँ, न संचालक हूँ मगर एक बेहतर दुनिया देखने की उम्मीद तो जिंदा है...और उसके लिए चलने की आँकाक्षा भी है। शायद कुछ ऐसा कर सकूँ जो कुछ नया करे। मेरा मानना (अनुभव भी है) है कि अगर आप अपना सम्मान नहीं कर सकते...अपने हृदय की आवाज नहीं सुन सकते तो आप किसी से प्रेम नहीं कर सकते...मगर यह आवश्यक है कि उसमें बदलने की आकाँक्षा हो..दूसरों को छलकर, रौंदकर आगे बढ़ने की जिद नहीं...एक रेखा के आगे दूसरी बड़ी रेखा खींच डालिए...जो पुराना है, वह खुद मिट जायेगा। अगर इरादे नेक और सृजनात्मक हों तो आत्मग्लानि की जरूरत नहीं है...। समस्या यह है कि लोग आपको एक ढर्रे में देखने के आदी होते हैं इसलिए आप कुछ अलग करते हैं तो उनके लिए आत्मसात करना कठिन होता है मगर यह आपको तय करना है कि आपकी राह कौन सी है। रही बात विवाह की...तो यह आपकी भावनाएँ हैं जो आपको पूरा करती हैं...तमाम संबंधों के बावजूद आपका व्यक्तित्व आपका ही होता है...मैं व्यक्तित्व के विर्सजन में विश्वास नहीं रखती और सबसे बड़ी बात यह है कि विवाह एक बहुत बड़ा दायित्व है...उसमें ईमानदारी और पारदर्शिता का होना जरूरी है...अगर आप निर्वाह कर सकते हैं तो जरूर करें मगर नहीं कर सकें या आपके लक्ष्य अलग हों तो उसी राह पर चलें....किसी अन्य का जीवन नष्ट करने का अधिकार आपको नहीं है...। मातृत्व और स्त्रीत्व स्त्री के जीवन का अंग अवश्य हैं मगर वे एहसास हैं और आपकी आत्मा से जुड़े हैं...आप किसी अनाथ बच्चे को गोद लें या बच्चों के लिए कुछ करें तो मातृत्व का एक रूप वह भी है। स्त्रीत्व का अर्थ सिर्फ दामपत्य नहीं होता..निश्चित रूप से वह एक अंग है मगर सिर्फ वही नहीं है..स्त्री का वास्तविक स्वरूप उसकी मनुष्यता में समाहित है। मैं स्त्री को मनुष्य के रूप में अधिक देखती हूँ...बाकी संबंध उसके बाद हैं मगर वह मनुष्य न रहे तो वह कुछ भी नहीं निभा सकती..न प्यार और न संसार और न मातृत्व। संबंध जब बोझ बनें तो वह आपको सिर्फ क्रूर बनाते हैं...उनको स्पेस दीजिए और अपने स्पेस का उपयोग और सम्मान करें...। मैत्री संबंधों की आत्मा है।अपने लिए लिखना भी कई बार अच्छा होता है...मैं का होना इतना खराब नहीं...इतना स्वार्थ भरा नहीं..कि उसे अहंकार से जोड़ा जाए..मैं में समूचे विश्व को समेटने वाली करुणा है...महसूस करना जरूरी है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आखिर हम महिला मीडियाकर्मियों से आपको इतना भय क्यों है साहब?

रेखा : आँधियों को आँखों की मस्ती से मात देती शम्मे फरोजा

वह उपेक्षित, प्रताड़ित स्त्री....मेरी माँ है