सिर्फ करुणा और ममता की मूरत नहीं है माँ : जमाना अब इमोशनल और टफ मदरहुड का है




आज है मदर्स डे...विदेशों में तो मदर्स बहुत हद तक मम्मी बन जाती हैं मगर भारत में इसके लिए बहुत से पर्यायवाची शब्द हैं मतलब..अलग - अलग भाषाओं और बोलियों में..माँ...अम्मा...माई...अम्मी...बेबे....आई और मम्मी...आजकल मॉम भी चलता है। ये अलग बात है कि मॉम कहना आज भी पुराने जमाने की माँओं को कुछ खास पसन्द नहीं है मगर काम तो भावना से है..। अगर भावना की बात की जाए तो भारत में माँ को ममता और करुणा का प्रतिरूप ही माना जाता है मगर इसके अतिरिक्त उसकी कोई और छवि हो सकती है, इसे हम स्वीकार नहीं करते। भारतीय परिवारों में सख्त माओं को अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता। कई बार अगर वह बच्चे को किसी गलती पर डाँटती है तो उसे ताने सुुनने पड़ते हैं मगर अब वक्त बदल रहा है और सख्त माँओं को भी स्वीकार किया जा रहा है। हाल ही में एक विज्ञापन वायरल हुआ था जो एक मॉस्न्यूटो कॉयल का विज्ञापन था और इसे प्रख्यात निर्देशक सुजीत सरकार ने निर्देशित किया था। विज्ञापन में एक सख्त माँ को दिखाया गया जो साथ में खाना खा रहे हैं और एक बच्चा रूठा बैठा है, खाने से इनकार कर रहा है। उसकी माँ की प्रतिक्रिया और सख्ती और उसकी वजह बहुत कुछ कहती है और परिवार का बुर्जुग उस माँ के समर्थन में खड़ा होता है। विज्ञापन की कैचलाइन थी कि ‘बच्चों के प्रति सख्त रहने के लिए माँओं की बहुत आलोचना होती है, यह समय है कि जब हम उनके साथ खड़े हों।’ वाकई यह समय है कि भारतीय समाज में मातृत्व की अवधारणा और छवि को बदलने की जरूरत है क्योंकि जितने भी अपराध बढ़ रहे हैं, उसके मूल में ही बच्चों को लेकर ‘सब कुछ चलता है’ वाला लचर रवैया है। बच्चों के बड़े होने का इंतजार करना कि सब ठीक हो जाएगा...बड़ा होकर कर लेगा...सुधर जाएगा...वाली मानसिकता बहुत कुछ बिगाड़ रहा है इसलिए ममता और करुणा के साथ सख्ती और अनुशासन भी जरूरी है। वैसे देखा जाये तो आमतौर पर भारतीय समाज को पितृसत्तात्मक समाज माना जाता है मगर हमारी परम्पराओं की तह में जाकर देखिए तो पता चलता है कि इस देश में मातृसत्ता की परम्परा रही है जो धीरे - धीरे जाकर पितृसत्तात्मक रूप लेती रही है। आज भी उत्तर - पूर्वी और दक्षिणी भारत में आपको मातृसत्तात्मक समाज दिख सकता हैं। माएँ कभी पति के साथ तो कभी अकेले भी अपनी संतानों का भविष्य बनाती रही हैं और सृष्टि का संरक्षण करती रही है। सीता, सत्यवती और कुन्ती को सिंगल मदर का उदाहरण माना जा सकता है और उनके पास अधिकार भी होते थे और वे सशक्त होती थीं। जन्म न भी दें तो पालने पर भी उनके अधिकार और सम्मान में कमी नहीं होती थी...कहते हैं कि कैकयी भी श्रीराम से बेहद प्रेम करती थीं और वनवास भेजने के बाद उन्होंने पश्‍चाताप किया मगर उनका चरित्र इतना दयनीय और दूसरों पर निर्भर नहीं रहा जितना ग्रँथों में दिखायी देता है। यशोदा और श्रीकृष्ण तो जग विख्यात है...आज भी देवकी के पहले माता यशोदा का ही नाम आता है। जीजाबाई और पन्ना धाय अपने आप में एक सशक्त उदाहरण हैं मगर समय बदलने के साथ ही यह छवि बीच में धूमिल हुई। माँओं को गाय की तरह सीधा माना जाने लगा...उसमें इतनी करुणा भर दी गयी कि उसके व्यक्तित्व के दूसरे पक्ष ही छिप गये मगर आज माताओं में करुणा, स्नेह और दया होना काफी नहीं है। यह परम्परा या यूँ कहें कि रूढ़ि...संतान कैसी भी हो मगर माँ तो माँ ही रहेगी और अन्याय पर भी संतान मोह में चुप रहेगी, इस छवि को तोड़ने की जरूरत है। ये स्पष्ट है कि अगर गाँधारी अपने पुत्र मोह का लोभ संवरण कर पातीं और सही समय पर विरोध करतीं या जरा भी सख्त होतीं तो सम्भवतः इस रक्तपात की जरूरत ही न पड़ती। सत्य यही है कि समाज में संतुलन साधने के लिए ममता काफी नहीं है बल्कि एक समय के बाद आपको सख्त होकर बताने की जरूरत है कि संतान के आचरण को भी एक अंकुश की जरूरत है और ऐसी स्थिति में माँओं को बहुत संवेदनशील बनकर समझदारी से काम लेना पड़ता है मगर हकीकत यह है कि बहुत सी भारतीय माएँ अपने बच्चों को लेकर प्रोटेक्टिव और पजेसिव हो जाती हैं कि उनको याद ही नहीं रहता है कि उनके बच्चे इस देश के नागरिक और किसी के दोस्त और जीवनसाथी बनने वाले हैं। कई बार मातायें बेटियों के जीवन में अत्याधिक हस्तक्षेप करती हैं तो कई बार बेटों को लेकर इतनी पजेसिव होती हैं कि कोई दूसरा उसकी जिन्दगी में गँवारा ही नहीं करतीं। मोह इतना कि बच्चे अगर कोई अपराध कर के आएँ, तब भी वे उनका बचाव ही करती हैं। खासकर बेटों के मामले में तो यह प्रवृत्ति और ज्यादा है। बेटियों पर अत्यधिक अनुशासन और बेटों को अत्यधिक छूट...हमारे देश में बढ़ते अपराध की जड़ है....अनुशासन की जरूरत दोनों ही क्षेत्रों में है इसलिए अब समय आ गया है माँओं की छवि को बदला जाये।  हालाँकि भारतीय सँयुक्त परिवारों में यह एक सख्त माँ बनना आसान नहीं है क्योंकि परिवार के अन्य सदस्य आपके खिलाफ खड़े हो जाते हैं मगर कहीं न कहीं आपको सीमा बाँधनी होगी क्योंकि संतान के सुरक्षित भविष्य के लिए महँगी शिक्षा और सुख व सुविधाओं से अधिक चरित्र निर्माण की जरूरत है। अब गाय बनकर करुणा की धारा बहाना काफी नहीं है..करुणा के साथ संवेदनशीलता और सख्ती का होना जरूरी है और मम्मा को स्वीट के साथ टफ भी बनना होगा और आज महिलाएँ ऐसी बन भी रही हैं...कामकाजी महिलाएँ अब बच्चों को न कहना और आत्मनिर्भर बनना सिखा रही हैं। यहाँ तक कि ग्लैमर की दुनियाँ में काम कर रही महिलाएँ भी अपने बच्चों को ग्लैमर से दूर एक साधारण परवरिश देना पसन्द कर रही हैं...मतलब जमाना अब करुणा और ममता से आगे जाकर टफ मदरहुड का है।

(सलाम दुनिया में मातृ दिवस पर प्रकाशित आलेख)

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