बख्शो, बख्शो, अब हमें बख्शो



इन दिनों महिलाओं को सशक्त बनाने की मुहिम टीवी पर चल पड़ी है। होना तो यह चाहिए कि इसमें खुशी हो मगर एकता कपूर की महिमा से छोटे परदे पर जिस तरह की औरतों को गढ़ा जा रहा है...और जिस तरह से पौराणिक चरित्रों और आख्यानों के नाम पर कचरा परोसा जा रहा है...उसे देखते हुए यह मुहिम एक मजाक से अधिक नहीं लगती। तमाम चैनल परम्परा और आधुनिकता की चाशनी को मजेदार बनाने की कोशिश में लगे रहते हैं और सबके बीच होड़ लगी रहती है। इन सबके बीच जो कचरा होता है वह औरतों का होता है...परम्परा के नाम पर इतिहास को तो छोड़ दीजिए...आख्यानों की जो दुर्दशा होती है...और बगैर किसी शोध के ठोस पुरातात्विक शोध के प्रचलित किवदंतियों के आधार पर जो धारावाहिक बनते हैं...उनके बारे में क्या कहा जाये...उनका एकमात्र ध्येय ही अपनी पराधीनता को महिमामंडित करते हुए ऐसे देवी - देवताओं और चरित्रों का गुणगान करना है जिनके कारण फजीहत आम औरतों की होती है क्योंकि हमारे घरों से लेकर सड़कों तक उनका असर पड़ता है।
कपिल शर्मा के शो में महिलाओं के कपड़े पहनकर महिलाओं के खिलाफ तमाम चुटकुले आपको सुनने को मिलेंगे और उन पर दहाड़ वाली हँसी हँसती अर्चना पूरन सिंह...कृष्णा अभिषेक से लेकर कीकू सारदा की ओवर एक्टिंग...और सुमोना पर कपिल के तंज भरे चुटकुले किस सम्मान को ध्यान में रखकर लिखे जाते हैं...ये वही जानते होंगे। बिग बॉस, मुझसे शादी करोगे की गाथा तो जगजाहिर है...एबीपी न्यूज को भी अक्सर सपना चौधरी की जरूरत पड़ती है और लॉलीपॉप के बगैर तो किसी का काम ही नहीं चलता।

आप मनोरंजन के नाम पर जो कचरा फैलाते हैं...उसकी दुर्गन्ध महिलाओं की दयनीय दशा को और बेहाल करती है। तो हमने सोचा कि अब इन पर भी बात की ही जाए। सबसे घटिया धारावाहिक एंड टीवी पर आ रहे हैं....सुभाष चन्द्र जी जी न्यूज पर राष्ट्रप्रेम की बात करते हैं और अपने इस चैनल पर औरतों की गरिमा को तार - तार करने वाले शो लाते रहते हैं...इन दिनों 'भाभी जी घर पर हैं' पर महिलाओं की गरिमा और सम्मान की कीमत लगायी जा रही है। एक समय था जब महाभारत में युधिष्ठिर ने द्रोपदी को दाँव पर लगाया था और आज इनके इस धारावाहिक में यह काम हो रहा है। पहले तो प्रमुख पुरुष चरित्रों को एक दूसरे की पत्नियों से फ्लर्ट करने का लाइसेंस मिला हुआ है...और अब भाभी जी सान्निध्य टैक्स यानी बीएसटी लगाने के एपिसोड का प्रचार चल रहा है। यहाँ गौरतलब है कि सन्तुलन के लिए 'जीजा जी छत पर हैं' भी, दिखाया जा रहा है। " लगभग इसी प्रारूप के साथ हप्पू  की पलटन भी दिखाया जाता है।

एक और धारावाहिक है...जय माँ सन्तोषी,,,,जहाँ सन्तोषी माँ अपनी भक्त को शत्रुओं से बचाती हैं और एक के बाद एक व्रत की कहानियाँ बताती हैं। ऐसी देवियाँ हैं जिनका पूरा समय एक दूसरे का जीवन हराम करने में बीतता है। यह धारावाहिक भी बड़े भक्ति - भाव से देखा जाता है। 21वीं सदी में आकर स्त्री चरित्र की ऐसी छवि गढ़ी जा रही है और जिन जर्जर रूढ़ियों से स्त्रियों का युद्ध अब भी जारी है,....उनमें जकड़ने की तमाम कोशिशें तेज हो गयी हैं। इसमें सास -बहू की साजिशें हैं....और तमाम वे कलह हैं जो पितृसत्ता को मजबूत करते हैं।
इसी चैनल पर 'गुड़िया हमारी सभी पर भारी' दिखाया जा रहा है जिनमें विवाह के नाम पर नायिका की अजीबो -गरीब शक्ल से आगे ले जाकर उसे शादी के नाम पर बन्दर की तरह पूँछ तक लगवा दी गयी है।  टीवी धारावाहिक के लिए स्त्री चरित्र मिट्टी के लोंदे से अधिक नहीं है.....उसकी जितनी दुर्दशा की जा सकती है, वह करने का लाइसेंस ऐसा लगता है कि चैनलों को दे दिया गया है।

 सोनी सब के अति लोकप्रिय धारावाहिक 'तारक मेहता का उल्टा चश्मा' में जेठालाल गडा बबीता जी को फ्लर्ट करते हैं। फ्लर्ट ही नहीं करते बल्कि अपनी दया को फटकारते हुए दिखते हैं और सभी को इनमें प्रेम दिखता है..यहाँ तक कि नायिका भी सिर झुकाकर ये सब स्वीकार करती है। नागिन. डायन, भूत - चुडै़ल...यही लोकप्रिय कंंटेंट हैं...और  हम उम्मीद कर रहे हैं कि हमारी नयी पीढ़ी तर्क और विवेक से भरी होगी...इससे हास्यास्पद कुछ नहीं हो सकता।
मेरी समझ में नहीं आता कि एक औरत क्या इतनी गयी - गुजरी है इन महानुभवों के लिए उनको आपस में लड़वाना, एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करना, अन्धविश्वास, आडम्बर और साजिशों में उलझाए रखना ही एकमात्र विकल्प है?
क्या स्त्री चरित्रों की कमी है इतिहास में या हमारे आस - पास? छोटे परदे पर तीन प्रकार की औरतें दिखीं....पीड़ित....खलनायिका....भोली और मनोरंजन की पात्र...और चौथा जो वर्ग है.. वह कभी - कभार ही दिखता है...ऐसा नहीं है कि अच्छे धारावाहिक नहीं हैं और वे लोकप्रिय नहीं हैं....मगर पितृसत्ता को लुभाने वाले उपरोक्त तीन तरह की औरतों का बोलबाला...हर चैनल पर है। जब आप बार - बार एक ही बात को कहते हैं तो  वही छवि मजबूत होती है...पौराणिक किरदारों में भी तमाम सशक्त और ऐतिहासिक चरित्र हैं मगर इन पर काम करने का जोखिम कोई नहीं उठाना चाहता।

हाल ही में समाप्त हुआ तारा फ्रॉम सतारा, मैडम सर, भीम राव अम्बेडकर जैसे कुछ धारावाहिक हैं....मगर दोहरापन अगर हम बर्दाश्त करते रहे तो हमें कुछ भी बदलने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। रही बात खबरिया चैनलों पर इन धारावाहिकों की रिपोर्टिंग की...उतनी ही नाटकीय और दोयम दर्जे की। मीडिया में काम करने वाली महिलाओं की समस्या और उपलब्धियों पर कोई बात नहीं करता...यह 30 साल पुरानी बात है मगर याद कीजिए जब रजनी और उड़ान जैसे धारावाहिक उस दौरान आते थे...हम आगे जा रहे हैं कि पीछे जा रहे हैं....आखिर एक महिला एंकर के लिए मन भर मेकअप थोपकर कैमरे के सामने आना जरूरी क्यों है...जबकि पुरुषों के सामने यह मजबूरी तो नहीं होती...। समझ में नहीं आता दिमाग वाली औरतों को कब ये धारावाहिक समझना और प्रस्तुत करना सीखेंगे....क्या आपको पता है...पता हो तो बता दें और ये भी यह कचरा कब तक बर्दाश्त किया जाना है?अभी तो अनामिका जी की कविता ही याद आ रही है....
हे परमपिताओं,
परमपुरुषों -
बख्शो, बख्शो, अब हमें बख्शो!

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