औरतों के हिस्से का इतिहास...वह भी कुछ होता है क्या ?

 


इतिहास प्रिय है...पढ़ना भी और खोजना भी। इन दिनों इतिहास के पन्नों से ही अपनी दोस्ती भी हो गयी है...पन्ने पलटते हुए एकाएक आदत के मुताबिक औरतों पर नजर चली ही जाती है। औरतों की ये कहानियाँ लुभाती तो हैं मगर डरा भी देती हैं...समाज को औरतों का बोलना रास नहीं आता...उसे गूँगी औरतें चाहिए...ऐसी औरतें चाहिए जिसमें चाबी भरी जाये और वह चल पड़े। जिन औरतों के पास दिमाग है...समाज ने कभी उसे पसन्द नहीं किया...जिन औरतों ने अपनी शर्तों पर जीने की कोशिश की....उनको सबक सिखाने के लिए क्या - क्या न किया मगर औरतें तो औऱतें हैं...आप उसे सींखचों में डालिए...वह आपका पिंजरा तोड़कर अपने आसमान में उड़ जाएगी...तभी तो उड़ती रही हैं....माधवी से लेकर गार्गी...जोन ऑफ आर्क...सावित्री बाई फुले...।

फिरंगी काली बाड़ी को कवर कर रही थी तो मंदिर के इतिहास को समझने के लिए पड़ताल शुरू की। पता चला कि पुर्तगीत फिरंगी ऐन्थनी हेंसमेन ने एक हिन्दू विधवा से विवाह किया...सौदामिनी देवी...। समाज को कहाँ रास आता कि एक विधवा फिर से विवाह करे और वह भी फिरंगी से...उसे तो मर जाना चाहिए था...आग की लपटों में खत्म कर देना चाहिए था लेकिन सौदामिनी जीना चाहती थी...तो उसने फिरंगी को अपना साथी चुन लिया...मगर समाज है..यहाँ चुनने का हक तो सिर्फ पुरुषों को है तो यह कैसे कहा जाए कि सौदामिनी ने विवाह किया तो कहा गया कि फिरंगी ने सौदामिनी से विवाह किया...समाज की भृकटि तन गयी क्योंकि फिरंगी कवियाल बन गया था...दुर्गा पूजा के आयोजन की तैयारी कर रहा था...इसलिए रूढ़िवादियों ने उसके द्वारा सजाये मण्डप को नष्ट कर दिया और सौदामिनी देवी को जला दिया.ऐसा फिल्म में दिखाया गया है...सच क्या है नहीं...पता। जिन्दगी फिर भी आसान तो नहीं रही होगी। सौदामिनी तो खो गयी इतिहास के पन्नों में। जिस औरत के नाम से किसी विशाल व्यक्तित्व की महिमा को ठेस पहुँचती हो...उसका नाम नहीं लिया जाता...और बड़े से बड़े घरानों का यही हाल है...ये नाम तो गाहे - बगाहे...स्त्रियाँ ही लिया करती हैं..बाकी जगहों पर तो टिप्पणी और एक -दो पन्नों में ही कहानी खत्म। जैसे कादम्बरी खो गयी...कवि गुरु को बनाकर...जैसे स्वर्ण देवी चौधरी और सरला देवी चौधरी कभी - कभी याद आ जाती हैं...महिलाओं की पूजा करने वाले बंगाल ने महिलाओं के साथ न्याय नहीं किया। समाज को पद्मावती चाहिए जो जौहर को धर्म समझती हैं...मीरा नहीं भाती उसे...जिसने खुलकर अपने प्रेम को अभिव्यक्त किया...मुझे मीरा की भक्ति में प्रेम के सिवाय कुछ नहीं दिखता.....मीरा ने तो प्रेम किया था....ईश्वर तो लोगों ने बना दिया...उसने आग में जलने से इन्कार किया और यातनाएं सहती रहीं, भटकती रहीं...कौन जाने मीरा के साथ क्या हुआ...सब कहते हैं कि प्रतिमा में समा गयी...कौन जाने...मीरा नहीं लौटना चाहती थी..इसलिए एकतारा छोड़कर चली गयी...हम नहीं जानते...औऱतों के इतिहास का तो कुछ पता ही नहीं होता...मुगल साम्राज्य में रहकर कृष्ण भक्ति करने वाली ताज बेगम का जीवन कहाँ आसान रहा होगा... लेकिन उनका नाम तो बस नाम लिया जाना ही काफी है...बात तो किसी रहीम, रसखान, कबीर, बीरबल या बिहारी पर ही होगी। श्रृंगार पर ही होगी...फिर वह कविता के नाम पर कचरा ही क्यों न हो....सावित्री बाई फुले..भी जब घर से निकलीं तो उन पर कीचड़ ही फेंकी गयी क्योंकि उनका अपराध था कि लड़कियों को पढ़ाना चाहती थीं वह...भारत की पहली महिला शिक्षिका...उनके नाम पर कोई दिवस हो...याद तो नहीं आता...न - जाने क्या - क्या दबाया गया है...वह दबाएंगे और हम निकालते जाएंगे...अब यही होगा।

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