देवी की जगह स्त्री को देखिए...महानता नहीं, सिर्फ करुणा ही दिखेगी


कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जो दिखने में अलौकिक लगती हैं, गरिमामयी लगती हैं मगर गहराई में जाकर देखने पर वह मार्मिक लगने लगती हैं।  हम जिनको महापुरुष समझ लेते हैं, उनके प्रति कुछ हद तक निर्मम भी हो जाते हैं....उनके दुःख या सुख हो सकते हैं या उनका कोई निजी जीवन हो सकता है या उनके निजी क्षण हो सकते हैं..ये बात न तो हमारे दिमाग में आती है और न ही हम सोचने की जहमत उठाते हैं....नहीं..सच तो हम डरते हैं....इतिहास उठाकर देख लीजिए हमारी महा नायिकाओं या महा नायकों का जीवन कभी सुखमय नहीं रहा...और हमारे लिए तो बस इतना मान लेना काफी रहा...उनकी बात और है...वह महान थे...तभी तो कर सके...उनको पीछे हटने की इजाजत नहीं है...सच पूछिए तो...कौन महान बनना चाहता है...जवाब मिलेगा कोई नहीं...सब शांति चाहते हैं...सुख चाहते हैं....धन का नहीं...मन का सुख...जिस नरेन को दुनिया ने स्वामी विवेकानन्द बना दिया....वह क्या नहीं चाहते होंगे...अपनी माता के आँचल में रहना...क्या उनको नहीं खलता होगा...कि उनके सिर पर हाथ नहीं है...बेटे और माता में दूरी रही और अपनी दुनिया के दुःख या सुख के बीच दोनों ही पत्थर बनकर सब कुछ सहते रहे...नहीं...मैं इसे अलौकिक आवरण नहीं दे सकती क्योंकि मैं एक मनुष्य की तरह सोचती हूँ,,,,माँ भुवनेश्वरी देवी का दुःख आँख से ओझल नहीं हो सकता...।
आप क्या कल्पना कर सकते हैं कि जिस घर में कोई कमाने वाला न हो. उस घर की शिक्षित सन्तान संन्यास लेकर समाज कार्य में जुट जाये तो उस घर की स्त्री पर क्या गुजरती होगी.....हम तो उनका नाम भी नहीं ले पाते...सबको वृक्ष दिखता है....जिस धरती के गर्भ में रहा...उस धरती के दुःख का क्या....कब बात करते हैं हम...किसी भुवनेश्वरी देवी या किसी कस्तूरबा के बारे में...नहीं...कस्तूरबा की कहानी तो अलग है...उन पर तो अलग से ही बात होगी...आज तो भुवनेश्वरी देवी को लेकर ही कहना है।



माता - पिता की इकलौती सन्तान, सुन्दर और असाधारण, अंग्रेजी समझने वाली और कविताएं लिखने वाली भुवनेश्वरी देवी ने ही तो नरेन्द्र को आरम्भिक तौर पर अंग्रेजी पढ़ाई थी। असमय वैधव्य और दस बच्चों की माता ने कैसे सहा होगा सब कुछ अपनी सन्तान का असमय निधन...पारिवारिक मुकदमेबाजी। जिस घर का खर्च हजारों में हो, उस घर के खर्च को क्या 30 रुपये तक ला देना क्या इतना आसान रहा होगा...इतिहास ऐसी गृहिणियों की त्याग और तपस्या पर बात नहीं करता। खेतड़ी महाराज अजीत सिंह जब तक रहे...स्वामी विवेकानंद का आग्रह रखते हुए भुवनेश्वरी देवी को 100 रुपये प्रतिमाह भिजवाते रहे...उनके जाने के बाद यह राशि बंद हो गयी...और भुवनेश्वरी देवी इसके बाद 9 साल जीवित रहीं...उनका निधन 1911 में हुआ....कैसे गुजारे होंगे उन्होंने ये साल,....हम क्या कभी बात करते हैं....नहीं करते...भला दरिद्रता औऱ करुणा में कैसा रस...स्वामी जी ने रामकृष्ण मिशन खड़ा करने के लिए अपना पूरा जीवन होम कर दिया...अपना घर - परिवार सब त्याग दिया...फिर विश्व जीतने वाले के घर का ख्याल तब बंगाल क्यों नहीं रख सका। उस दौर में धनपतियों की तो कोई कमी नहीं थी...फिर क्यों नहीं कोई आगे आया....? भुवनेश्वरी देवी ही क्यों माँ शारदा को ही कब समझा हमने....एक 6 साल की बच्ची का विवाह 23 साल के एक युवक से होता है...युवक भी ऐसा जो अद्भुत है...अपनी ही धुन में रहने वाला..अपनी माँ का परम भक्त..जिसके बारे में लोग कहते हैं कि उसकी मानसिक अवस्था का कोई ठिकाना ही नहीं रहता। पत्नी के हृदय की शंका और आशंकाओं पर कब बात होती है...हम तो बस मान लेते हैं कि पवित्रता की देवियों के पास हृदय होता ही नहीं, होता भी है तो उनके लिए तो हृदय रखना ही अपराध है...क्या सुख के उन क्षणों पर अधिकार नहीं था उस नवयुवती का?
हम बखान करते हैं कि रामकृष्ण परमहंस ने पत्नी में माँ को देखा...पर क्या पत्नी यही चाहती होगी...क्या उसकी कोई इच्छा नहीं होगी...पति की इच्छा के अनुरूप स्त्री सब कुछ छोड़ दे...अपना जीवन ढाल ले...यह भी भूल जाये कि वह क्या हुआ करती थी...तो वह महान है...पवित्रता की प्रतिमूर्ति है..आप चाहेंगे कि तुलना न हो मगर असमानता होगी तो तुलना भी होगी....क्योंकि पतियों के लिए कोई नियम नहीं बना...और न ही उनको अपना जीवन कभी पत्नी के लिए बदलना पड़ा है...जब भी कुछ छोड़ा है, वह स्त्री ने ही छोड़ा है इसलिए वह सवाल तो करेगी और आपको जवाब भी देना होगा।   कहानियों की अलौकिकता को छोड़कर अगर धरातल पर बात की जाए....एक स्त्री की आँकाक्षाओं...उसकी सोच के लिए तो समाज में कभी जगह बनी ही नहीं...सदियों से चली आ रही परम्परा औऱ पति की इच्छा के अनुसार खुद को ढालकर एक युवती देवी बन गयी औऱ हम उनको माँ शारदा कहते हैं। इनको भी अपना जीवन दरिद्रता के बीच ही गुजारना पड़ा।
आपका समाज सिर्फ नाम बदलता है... स्त्रियों का जीवन खुद तय करता है और अपने साँचे में ढालकर उनको देवी बना डालता है... मुझे देवियों में गरिमा से अधिक करुणा दिखती है....क्योंकि देवी नहीं...ये सब मुझे स्त्री लगती हैं....मानवी लगती हैं...जीवन का सत्य तो यही है।









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