संयम, अनुशासन, सृजन, सकारात्मकता ..बस यही मंत्र हैं कोविड ही नहीं, जीवन के भी

 


जीवन में ऐसा समय आता है और ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं जब आप ही अपने पास होते हैं। यह समय आत्मविश्लेषण का होता है, चिन्तन का होता है और इसके लिए एकान्त जरूरी होता है। भीड़ में रहकर खुद से बात होनी मुश्किल होती है। जब यह पँक्तियाँ लिख रही हूँ तो समूचा विश्व कोविड -19 की चपेट में है, काल का तांडव, मृत्यु की विभीषिका है, प्रकृति के कोप से पूरा देश और पूरी पृथ्वी आक्रांत है और इस बीच बहस चल रही है, विवाद हो रहे हैं, ऑक्सीजन और दवाओं की कालाबाजारी हो रही है..एक दूसरे को नीचा दिखाने और कमतर साबित करने की होड़ लगी है...मुख पर प्रेम और हृदय में घृणा है..आस - पास के ऐसे लोगों को जाते देख रही हूँ जिनको देखते हुए बड़ी हुई...सीखा...मन क्लान्त हो पड़ा है...हम दिखावे की ऐसी दुनिया में जी रहे हैं जहाँ उदारता से लेकर रोग तक, सब प्रदर्शन की वस्तु बन गये हैं..

जरा सोचिए तो ईश्वर ने ऐसी ही दुनिया दी थी आपको? क्या ऐसा ही संसार दिया था..? यही देश था जहाँ लोग दीर्घायु हुआ करते थे...स्वस्थ रहा करते थे और तब आज की तरह महँगी चिकित्सा प्रणाली भी नहीं थी। आविष्कार हमारी आवश्यकता हैं परन्तु जब लालच की पूर्ति का हथियार बन जायें तो प्रभाव खोते भी हैं..अभी 90 प्रतिशत लोग कोविड -19 की चपेट में हैं तो मैं भी तमाम सावधानियों के बावजूद मैं भी इसकी चपेट में आ ही गयी तो आश्चर्य क्या था..मगर पहले से ही सोशल मीडिया पर इसकी घोषणा कर देना तो भय का ही संचार करने वाला था। विश्वास का सम्बन्ध आत्मा से होता है...श्रद्धा से होता है, धर्म अगर विश्वास को धारण कर ले तो मजबूत होता है पर रूढ़ियों का चोला धर्म पर ओढ़ा दिया जाए तो धर्म की हानि होती हैं...तो अपना तो आधार ही विश्वास रहा...और इसी ने रक्षा भी की। वैसे भी आराधना विधि के विधान को या कठिनाइयों को टालने के लिए नहीं होती,  वह इसलिए होती है कि ईश्वर ऐसी परिस्थितियों में भी अपनी कृपा बनाएं रखें,  कठिनाइयों से लड़ने और उन पर विजय पाने अथवा उनको सहने का साहस दें...और ऐसा होता है,  

जिसको किसी विशेष कार्य से भेजा जाता है,  उनका जीवन कभी सरल होता ही नहीं क्योंकि उनको प्रेरणा बनना होता है,  प्रेरणा बन सकें,  भेजा ही इसलिए जाता है जिससे आम लोग उस मार्ग पर चल सकें । ईश्वर जब कठिनाई देते हैं,  उन पर सच्चे हृदय से विश्वास रखने वालों का रक्षण करने के लिए पहले से ही तत्पर रहते हैं,  सहने और विजय पाने और आगे बढ़ने की शक्ति भी देते हैं,  मार्ग दिखाकर खुद लक्ष्य तक ले जाते हैं..हर क्षण रक्षा करते हैं...और यह समय देखिए सब ईश्वर को पुकार रहे हैं..कोई निर्मम बता रहा है तो कोई विश्वास रख रहा है...कोई एक दूसरे को कोस रहा है तो कोई सरकारों को दोष दे रहा है...औऱ यहीं पर कोई खुद से सवाल नहीं कर रहा है....

आज कृत्रिम ऑक्सीजन के लिए दौड़ लगाते मनुष्यों को ईश्वर ने ऑक्सीजन प्रदाता वृक्षों और वनों से लदी धरती ही दी थी तो वृक्ष काटते हाथों ने क्या यह भयावह भविष्य देखा होगा...नहीं देखा होगा..अगर ऐसा भविष्य देखते तो हाथ उठते ही नहीं कुल्हाड़ी उठाने के लिए...तो दोषी कौन?

हम बचपन से ही सुनते आए कि धूम्रपान, मदिरापान हमारे फेफड़ों को नष्ट करते हैं। हमारी प्रतिरोधक क्षमता खत्म होती है मगर आपने इन दोनों को बुरी आदत नहीं माना बल्कि कवियों ने भी महिमामंडन किया। नशे की लत ऐसी कि लॉकडाउन से पहले और लॉकडाउन के बाद पहली कतार यहीं लगती है तो ऐसे में पहले से कमजोर पड़े फेफड़े खराब होते हैं और इन पर कोविड -19 समेत अन्य बीमारियों का प्रहार होता है तो दोषी कौन?

पढ़ा - लिखा शिक्षित मध्यम वर्ग भी मानता है कि उसका काम सिर्फ टैक्स भरना है, इसके आगे कोई जिम्मेदारी नहीं मगर बात जब खुद पर आती है तो उसे लगता है कि वह अकेला ही सब कुछ क्यों करे? क्या आप किसी संस्थान के मालिक होते हैं तो वेतन दे देने से आपकी जिम्मेदारी पूरी हो जाती है...अगर नहीं तो सिर्फ टैक्स भर देने से आपकी जिम्मेदारी पूरी कैसे हो सकती है? प्रवासी श्रमिकों को काम से निकालने और शहर से निकालने में सुशिक्षित लोगों की बड़ी भूमिका है। इनका काम सोशल मीडिया पर 4 शब्द लिखने से या लम्बी सी कविता लिख देने से पूरा हो जाता है। ऐसे में अगर अपने जीवन की रक्षा करने के लिए हर ओर से सताये गये ये लोग राशन की दुकानों के सामने परहेज के सारे नियम भूल जाएं तो जिम्मेदारी किसकी है? नेताओं की रैलियों में 5 रुपये और भात के लिए अगर भीड़ लगा लें तो दोष किसका है? अगर प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक को कोविड से पहले चुनावों की चिन्ता हो तो कोविड और चीन को दोषी कहकर क्या बिगाड़ लेंगे आप? मास्क पहनाने के लिए जहाँ पर पुलिस तैनात करनी पड़ रही हो, कोरोना योद्धाओं को सम्मान जताते हुए उनको घर से बाहर निकालने के लिए लोग खड़े हों तो क्या उस देश के लोगों को कोई अधिकार है कि वह दूसरों पर उंगली उठाए? 

उपकरणों पुर निर्भर रहने की ऐसी लत लगी कि आप बात कहने के लिए भी उसे लिखते हैं...चिट्ठी लिखना आपको डाउन मार्केट लगता है। जिस देश में अड्डा. चौपाल, आंगन की परम्परा हो...जहाँ आध्यात्मिक चेतना हो...जहाँ एकान्त में सृजन की परम्परा रही हो...वहाँ के लोग कुछ दिन अलग रह जाने से घबराते हैं...आप खुद सोचिए कि आप कहाँ थे और कहाँ आ गये हैं। आज वीडियो कॉल है, सोशल मीडिया है...मगर कुछ नहीं है तो अपने लिए कुछ समय निकालने की ललक, अपने मित्रों से रूबरू होने की चाहत, हम अनौपचारिकताओं के बीच अनौपचारिक हो रहे हैं...जुड़ रह हैं ऊपर से। हमारी सारी रुचियाँ फेसबुक, सिनेमाहॉल, मल्टीप्लेक्स, मॉल, रेस्तराओं तक सिमट गयी है...छोटी - छोटी बातें पीछे छूटती गयीं। किताबों की जगह भी डिजिटल उपकरणों ने ले ली और कागज की वह सोंधी - सोंधी गन्ध भी हम भूलते जा रहे हैं...बस कितना कुछ तो है सोचने के लिए...। बच्चों को सुविधाओं के मायाजाल में ऐसा बाँधे जा रहे हैं कि एक हल्की सी चोट और हल्की सी तकलीफ भी उन पर भारी पड़ रही है।

एकान्त शब्द नया नहीं है, न भारतीय परम्परा और संस्कृति के लिए और न मेरे लिए ही। अपना जो कार्यक्षेत्र है. जितनी भी रुचियाँ हैं...सब की सब एकान्त की माँग करती हैं..स्वभाव भी ऐसा ही मिला है...सम्भवतः इस एकान्तवास से दिक्कत नहीं थी...हाँ ये सच है कि कोविड के दौरान मन आशंकित होता है, मन में घबराहट भी होती है, कभी बार यह भी सोचना कठिन होता था कि अगली सुबह कैसी होगी..मगर मेरा विश्वास अटूट था..मैं बार - बार कहती हूँ कि ईश्वर मुझसे प्रेम करते हैं...और कृष्ण से बहुत प्रभावित हूँ...अपने पार्टनर ही लगते हैं और समग्रे एकम् भी..माता सरस्वती ने भी अपनी कृपा रखी है तो मनोबल उन्होंने टूटने नहीं दिया..सम्भवतः यही कारण था कि कोविड या एकान्तवास मेरे लिए भय नहीं बन सका बल्कि खुद की खोज का एक माध्यम बन गया। घर में चिन्ता तो सब करते हैं मगर चिन्ता के साथ जो साथ रहा...वह निःसन्देह मेरी भाभी ही हैं...।  अच्छी - बुरी...मीठी - कड़वी तमाम स्मृतियों के बीच आज अच्छी या बुरी जो भी हूँ, श्रेय इनको ही जाता है...मेरी कड़वाहट का भी और मेरे अनुशासित जीवन का भी। कई बार लगता है कि ईश्वर ने जैसे इनको मेरे लिए ही भेज दिया है..क्योंकि मेरे संघर्ष और मेरी सफलताओं का कारण और उद्देश्य इनके बगैर पूरा नहीं होता..तो इस एकान्तवास में अगर कोई सेनापति की तरह खड़ा था। स्त्रियों में कितनी शक्ति, कितना सामर्थ्य, कितना मानसिक बल होता है और इसे वह किस तरह से समाज के हित में उपयोग में ला सकती है,..यह और अधिक स्पष्ट हुआ। 

स्त्री एक धुरी है औऱ समूचा विश्व इसके चारों ओर घूमता है मगर विडम्बना देखिए कि लोग धुरी को ही किनारे पर रखना चाहते हैं,..अगर धुरी को सम्मान मिलता तो सोचिए कि दुनिया कितनी सुन्दर होती..अगर उसे बार - बार यह बताने की जगह कि उसका दिमाग उसके घुटनों में है या वह नहीं समझेगी, अपना दिमाग न लगाए, उसके विकास के लिए द्वार खोले जाते, स्त्री तो पुरुष की प्रगति में अपना सुख खोज ही लेती है, पुरुष भी स्त्री की प्रगति में अपना सुख देखता। यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि स्त्री का मतलब यहाँ पत्नी, माँ या बेटी नहीं है बल्कि वह आपकी बहन या कोई भी स्त्री हो सकती है..चाहे वह सड़क पर हो या कार्यस्थल पर।

दो दिन ऐसा ज्वर रहा कि बिस्तर से उठ ही न सकी...2 - 3 दिन बाद पुष्टि हुई कि हल्का संक्रमण है। घबराना चाहिए था...मैं नहीं घबरायी क्योंकि मैं मानती हूँ जो होता है, उसके पीछे ईश्वर की कोई इच्छा होती है...कष्ट है तो निवारण भी वही है। मैंने बस यही कहा, जो तुम्हारी इच्छा, तुम समझो, तुम्हारा काम समझे, मेरे वश में वही है जो राह तुम दिखाओ। सम्भवतः युद्ध से अधिक समर्पण ही था मगर कोविड के प्रति नहीं, मेरे विश्वास के प्रति। मेरे हर कार्य में यही है....मैंने कुछ नहीं किया...जो होना है, वह तो होता ही, मैं निमित्त और माध्यम मात्र हूँ । मैं न होती तो कोई और होता मगर होता जरूर तो मैं भाग्यशाली और आभारी हूँ कि मुझे चुना गया।

मैं जानती हूँ कि कि तर्क और बौद्धिकता के परिवेश में विश्वास एक कोरी कल्पना मानी जाती है मगर यह सत्य है...और इसका प्रमाण मैं खुद हूँ,,,,मेरा पूरा जीवन है...आप विश्वास कीजिए,,,वह आपको कभी अकेला नहीं छोड़ेगा...विश्वास में जब आप सौदेबाजी करने लगते हैं, तब दिक्कत होती है...बार - बार कोई आपसे लगातार माँगता ही रहे तो आप भी एक समय के बाद उससे किनारा कर ही लेंगे...कोई देता रहे और देता ही जाये..योग्यता और अयोग्यता देखे बगैर, हम उस वस्तु को पाने के योग्य हैं भी या नहीं, यह विचार भी नहीं आता...हमें हर चीज अपने हिसाब से चाहिए और सर्वश्रेष्ठ चाहिए...और वह हमें वह देता है, जिसके हम योग्य होते हैं...। आप खुद को सर्वश्रेष्ठ मानिए, उसके लिए तो प्रकृति का हर जीव बराबर है...पशु - पक्षी, वृक्ष,,,सब बराबर हैं उसके लिए तो जब ईश्वर की एक सन्तान के लालच और असन्तोष के कारण समूची सृष्टि ही खतरे में पड़ जाए तो यह तो होना ही था।

हमारे पूर्वजों का जीवन प्रकृति के साहचर्य़ का जीवन था..वह उतना ही लेते थे जितना आवश्यक होता था...जितने की आवश्यकता होती थी, उतने की ही इच्छा रखते थे। आप किसी का भी जीवन उठाकर देखिए..वनों औऱ वनवासियों के साथ प्रकृति का संरक्षण ही किया उन्होंने..हम राम और कृष्ण को पूजते हैं...शिव की आराधना करते हैं पर उनके जीवन से हमने क्या सीखा...कुछ भी तो नहीं..वेदों में प्रकृति की आराधना है...,वेदों से प्रेम है तो प्रकृति से प्रेम करना सीखिए...संस्कृति से प्रेम है तो प्रकृति का संरक्षण करिए..,.आपने प्रकृति से खिलवाड़ किया...ईश्वर अपनी संतानों का क्रन्दन कैसे देख पाता इसलिए यह एक दंड ही समझिए...एक वृक्ष को 10 पुत्रों के बराबर माना गया है। आधुनिक युग में आचार्य़ जगदीश चन्द्र बोस ने भी प्रमाणित किया कि पौधों में जीवन होता है...आप उनको जीवन देते, वृक्ष लगाते तो सम्भवतः ऑक्सीजन प्लांट की जरूरत ही न पड़ती.. जो देता है, वही श्रेष्ठ होता है, छीनने वालों को श्रेष्ठ होने का दम्भ रहता है और वे अपनी श्रेष्ठता का प्रमाणपत्र दूसरों से चाहते हैं....आप एक नकली जीवन जीते रहे और इसे अपनी उपलब्धि मानकर अपनी पीठ थपथपा रहे हैं पर हुआ क्या....प्रकृति के प्रतिकार ने आपको आपकी जगह दिखा दी।

रही बात मेरी तो मेरे साथ अच्छी बात यह थी कि पढ़ने का शौक था और एकान्तवास में तीन किताबें पढ़ गयीं...जिनमें से एक पर लिखने का मन भी है। वह पुस्तक लोकगीतों पर आधारित है...फिर डीआईवाई देखकर कुछ चीजें बनायीं.,,मेरा ख्याल रखने में मेरी टीम शुभजिता की बच्चियाँ भी पीछे नहीं रहीं। फोन पर हाल - चाल लेना, कैसे - क्या करना है वह बताना, हिम्मत बंधाना...और अपना काम जारी रखना...जैसे इन सबने जिम्मेदारी ले ली। इस बीच विष्णुकांत शास्त्री की कविताओं पर कोलाज भी गया और दूसरी चीजें भी,पेंटिंग भी हुई। कहने का मतलब यह कि खुद को व्यस्त रखा औऱ चूँकि यह सारी चीजें मेरे मन की थीं इसलिए खुशी भी मिलती थी। इसके अतिरिक्त व्यायाम और ध्यान, ये दो चीजें मेरी जीवनचर्या का अंग बनीं। हाँ, यह था कि एकान्तवास में और कोविड संक्रमण के कारण लोग दूर रहना चाहते हैं...आप अलग रहते हैं, अगर आप मानसिक तौर पर तैयार न हों तो तकलीफ होती है लेकिन ऐसे में जरूरी है कि आप उनकी जगह पर रहकर सोचें...मेरा कमरा मैं बंद ही रखती हूँ...अक्सर..मैंने खुद ही सबको दूर रखा..,...मैं मानसिक तौर पर तैयार थी...जब भी मन आशंकित होता किसी न किसी का फोन आ जाता, ध्यान दूसरी ओर लग जाता..तो नकारात्मक हो ही नहीं सकी।

एक दिन ऐसे ही बैठी थी और रवीन्द्र संगीत रिकॉर्ड करके नवनीता मैम को भेजा..और फिर उन्होंने बताया कि संगीत अभ्यास को और बेहतर कैसे बनाया जा सकता है,...अब सुरसाधक के साथ संगीत अभ्यास भी आरम्भ हो गया है...कुल मिलाकर जीवन में संयम, अनुशासन, सृजन, सकारात्मकता है...अब अपना ही बेहतर संस्करण हूँ मैं...और यह जारी रहे, यही कामना है...सुबह उगते सूर्य़ को देखना, गायत्री मंत्र पढ़ना. संगीत अभ्यास करना...योग करना, ध्यान करना, पढ़ना, रचना. मेरे यही मूल मंत्र हैं।   योग मन को शांत रखता है...बोलती भी हूँ और लड़ती भी हूँ मगर हमेशा की तरह त्वरित प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं, उस पर खोज चलती है, विचार मंथन होता है..नये - पुराने कवियों को गा रही हूँ,,,,सृजन से समृद्ध हो रही हूँ...खुद को तलाश रही हूँ...गढ़ रही हूँ..यात्रा जारी रहे...और क्या चाहिए...जीवन अनुभवों से सीखने का ही तो नाम है,,,सीख रही हूँ...धन्यवाद ईश्वर।


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