बौद्धिक विमर्श से अधिक संवेदना का पर्व है छठ

छठ पूजा मेरे लिए सिर्फ प्रकृति विमर्श है, यह यात्रा स्त्री विमर्श से आगे की है, याद रखिए हम सूर्य को पूजते हैं और छठी मइया उनकी बहन हैं माँ दुर्गा का कात्यायनी रूप और ये बात इस पर्व पर काफी कुछ पढ़ने के बाद कह रही हूँ, छठ स्त्री विमर्श का नहीं, जेंडर समानता का पर्व है, दिक्कत य़ह है कि कर्म कांड तो हम खूब करते हैं पर उसकी मूल बात नहीं पकड़ते.. जाति- वर्ण, सब कुछ कर्म से निर्धारित था, आपने सुविधा के लिए बर्थ राइट को आधार बना लिया, और राज करने लगे, भाग्य से कर्म नहीं बनते, आपका कर्म ही आपका भाग्य निर्माता है कर्म ही थे कि कर्ण को हम महारथी कहते हैं, किसी के घर में चांदी का चम्मच लेकर पैदा होना आपकी उपलब्धि नहीं है, आपने कोई तीर नहीं मारा, लेकिन अगर आप उस चम्मच का सदुपयोग करते हैं, उसका सुख वंचितों तक पहुंचाते हैं, तो वह आपका कर्म है, जमशेद जी टाटा, भाई हनुमान प्रसाद ,अजीम प्रेम जी . आज उदाहरण के लिए टाटा समूह को देखिए, मुझे उद्योगपति प्रेरित करते हैं, बहुत मुश्किल होता है अपना काम खड़ा करना... पर्व का सुख पूंजी के रास्ते ही आता है ...... रही हमारे स्त्री विमर्श की तो गार्गी से द्रौपदी तक...लंबी परंपरा है, थेरी गाथाओं से लेकर लोकगीतों में जो पीड़ा है, वही विमर्श है...विमर्श से आगे अब समाधान हो....छठ पुरुष भी करते हैं और दउरा उठाने से लेकर हर छोटी बात में बगैर किसी नखरे के सक्रिय रहते हैं....हमारे मुख्य और त्योहार होली, दीपावली , रक्षा बंधन , छठ .. हैं.बाकी सब बाद में जुड़े हैं, और इनके प्रसार में बाजार और हम खबरचियों की बड़ी भूमिका है... कोई भी आम पुरुष या स्त्री के दायरे में बंधकर कोई त्योहार नहीं मनाता, यह हम पढ़े- लिखे लोगों का काम है, छठ किसी माँ के लिए वह कारण है, कि वो उन बच्चों को देख सके, जिनको सालों से नहीं देख पाई, छठ घाट पर जाने की ललक है, हम बिहारियों से पूछेंगे तो छठ उल्लास है, टीस है, कसक है, मुझे छठ को देखना पसंद है, पढ़ना पसंद है पर विश्वास और भावना का जो तार मेरी माँ जोड़ सकती हैं, मैं नहीं जोड़ सकती और यही सच है और उनको किसी स्त्री विमर्श से कोई फर्क़ नहीं पड़ता। छठ किसी पिता के आँखों की नमी है, किसी के लिए 4 पैसे कमाने का अवसर है और उसमें भी श्रद्धा जुड़ी होती है, हमने अपनी भक्ति को शक्ति बनाया और उसे विश्वास की विजय के उल्लास में बदला है, यही भारत है छठ को सोचिए मत, सिर्फ महसूस करिए। समय के अनुसार आगे ले जाने के लिए जोड़िए, अगर आपका योगदान शक्कर की तरह होगा तो वही परंपरा की तरह घुल जाएगा .. सबसे बड़ी बात क्या हम बगैर विमर्श के जी नहीं सकते? क्यों हमारी बौद्धिकता को हमने अपनी बेड़ियों में तब्दील कर दिया है? कुछ देर के लिए खुद को खुद से मुक्त करना भी जरूरी है, जिससे ताजी हवा मिल सके। छठ समेत हर एक त्योहार वही ताजी हवा है ‐--- सौ बात की एक बात छठ हर एक विमर्श से आगे है, ऊपर है और स्त्री विमर्श बहुत जरूरी और गहरी चीज़ है और स्त्री विमर्श ही क्यों, पुरुष विमर्श भी उतना ही जरूरी है, हम समग्रता से देखना कब सीखेंगे? खैर समग्रता से देखने में समय है, मानव विमर्श की प्रतीक्षा है...पर तब तक ठेकुआ खाईं पीछे गीत बाजता मोरा सवा लाख के साड़ी भीजे साड़ी भीजे त भीजे, कोसी हमार नाहीं भीजे। इस जिजीविषा, विश्वास को असंख्य प्रणाम 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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