वह उपेक्षित, प्रताड़ित स्त्री....मेरी माँ है

मन....मनोविज्ञान...मानसिक स्वास्थ्य और स्त्री का मन...हलचल मचा रहे हैं मन में। मन को कौन समझ पाया है भला...और स्त्री के मन को समझने की कोशिश भी कौन करता है। स्त्री माने मातृशक्ति.....स्त्रीत्व अपने आप में एक पूरा शब्द है और मातृत्व इसका एक रूप मगर इस एक रूप ने स्त्री के समूचे अस्तित्व को ढक दिया है। स्त्री माँ है मगर सिर्फ माँ ही नहीं है..जाहिर है कि जब समाज उस पर यह दायित्व थोपता है तो उसके मन में ममता की जगह द्वेष लेने लगता है। आज मैं स्त्री के मन को समझने की कोशिश कर रही हूँ। कोई भी चीज पूरी तरह श्वेत या पूरी तरह श्याम नहीं हो सकती, वह धूसर भी हो सकती है। हमारे समाज में पितृसत्तात्मक सोच ने स्त्री को इतना असुरक्षित किया...कि वह अपनी करुणा, अपनी ममता...अपना स्त्रीत्व सब खो बैठी...जब उस पर किसी और के दायित्व थोपे गये तो उसके मन में जो विद्रोह हुआ...उसने ही द्वेष का रूप ले लिया और पता है उस द्वेष का बोझ उस दूसरी स्त्री के निरपराध बच्चे उठाते हैं..............आजीवन....जो जिन्दगी भर समझ ही नहीं पाते कि आखिर उनसे ऐसा क्या अपराध हुआ कि वह जिसे माँ कहते आ रहे हैं, वह उनसे प्यार ही नहीं करती...आखिर क्यों उसके अधिकार...उसकी खुशियाँ नोंचकर किसी और को दे दी जाती हैं..मन तब शांत होता है जब वह यह मान लेते हैं कि माँ का या पिता का प्रेम उनके लिए नहीं है...मगर जब पता चले कि वह जिसे माँ समझता आ रहा है...उसके लिए वह सामाजिक बन्धन है और एक थोपा गया कर्त्तव्य या लोगों के शब्दों में कहूँ तो वह किसी परिवार का हिस्सा नहीं बल्कि किसी के टुकड़ों पर पलने वाला व्यक्ति है...तो क्या आप इस स्थिति को स्वीकार कर सकेंगे ? मातृत्व का महत्व हमारे शास्त्रों में, इतिहास में, साहित्य में हर जगह वर्णित है। माँ को देवी माना गया है........ नहीं...माँ को देवी मत कहिए...वह एक स्त्री है और उसे मनुष्य ही रहने देना चाहिए। आज मैं बीच में खड़ी हूँ और एक उलझे हुए सम्बन्धों की परिणति देख रही हूँ क्योंकि सबके तार मुझसे जुड़ रहे हैं। क्या यह अच्छा नहीं होता है कि किसी सम्बन्ध को सहने और ढोने की जगह उसे बैठाकर स्पष्ट रूप से बताया जाता कि वह जहाँ है, वह परिवार उसका नहीं है...हाँ...कष्ट होता...अवश्य होता पर षडयंत्र रचने से तो यह बेहतर ही समाधान होता। एक स्त्री से यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि वह अपनी सौत की बेटी से उतना ही प्रेम करेगी....जो दूरी है...वह रहेगी मगर इतना स्वीकार करने की हिम्मत तो होनी चाहिए कि उस संतान का सम्बन्ध उसके पति से है और उसकी विरासत पर अधिकार भी उतना ही है। मगर...नहीं...अपनी संतान का मोह किसी स्त्री को कैकयी...गांधारी औऱ तिष्यरक्षिता बना सकता है और पुरुष को धृतराष्ट्र। सब मन की बात है..मन के उलझन की बात है...कौन सा मानसिक स्वास्थ्य......? मैं तमाम चीजों को जोड़कर भी इस स्थिति को न्यायोचित नहीं ठहरा पा रही हूँ कि अपनी संतान न होने भर से या संतान के हितों के नाम (अथवा अपने भविष्य की सोचकर) पर किसी स्त्री को या किसी पुरुष को अराजक, हिंसक, अहंकारी और षडयंत्री बनने की छूट दी जा सकती है। एक प्रश्न यह भी आता है कि माँ के रूप में क्या हर उस स्त्री को सम्मान दिया जाए जो ममता और संतान की सुरक्षा और उसके हितों के नाम पर किसी और के अधिकार दबाने लगे? मेरा प्रश्न थोड़ा अटपटा लग सकता है मगर मातृ - पितृ - गुरु पूजन के बीच क्या उनकी बुराइयों, अपराधियों और गलतियों से भी प्रेम किया जाना चाहिए या उसे आदर्श माना जाए? मेरी दृष्टि में इसका उत्तर 'न' में है। संतान के हितों की सुरक्षा के नाम पर किसी भी माँ की क्रूरता..अन्याय, भेदभाव और पक्षपात का किसी भी दृष्टि से समर्थन नहीं किया जा सकता। इसी तरह परिवार की भलाई के नाम पर अगर आप किसी के अधिकार दबाकर बैठ जाते हैं तो वह मेरी दृष्टि में अपराध ही है। आज की बतकही एक उपेक्षित, प्रताड़ित और अभिशप्त माँ को उनका अधिकार और सम्मान दिलवाने का प्रयास है और मैं बस एक माध्यम हूँ क्यों लग तो ऐसा रहा है जैसे कलम मैं नहीं ईश्वर ही चलवा रहे हैं। आज की यह पोस्ट उन लोगों के लिए भी है जो यह कहते हैं कि पिता और भाइयों के रहते हुए किसी लड़की यानी बहन को सम्पत्ति की जरूरत क्या है या उसका सम्पत्ति में हिस्सा माँगना सम्बन्धों को तार - तार कर देना है। आज उस जरूरत पर भी बात करूँगी और केस स्टडी मेरी अपनी जिन्दगी होगी, उसके अनुभव होंगे। यह सम्पत्ति ही है जिसके दम पर कोई व्यक्ति खुद किसी का मालिक समझकर उसके साथ नौकरों से भी बदतर व्यवहार करता है। एक परम्परा सी बन गयी है कि घर का बड़ा व्यक्ति ही सारे फैसले करता है, अपनी मर्जी से करता है और माइंड गेम खेलकर उसके लिए सहमति ले भी लेता है। तब ऐसी ही गांधारियाँ अपनी बेटियों के खिलाफ अपने बेटों के अत्याचार में पूरी भागीदार बनती हैं और अपनी मर्जी से बनती हैं। औरतें भी अपना फायदा देखती हैं। आज जो कह रही हूँ, वह कहना इसलिए भी जरूरी है कि इस कुचक्र को रोकना और खत्म करना जरूरी है क्योंकि संयुक्त परिवारों में इस तरह का व्यवहार, बर्ताव सामान्य मान लिया गया है और अगर अपराध सामान्य होने लगें तो धरती पर लड़कियों का जीना दूभर हो जाएगा। पिता के बाद उसका बेटा यानी घर में कोई लड़की हो भी तो उसे अपने भतीजों के अधीन ही रहने और रखने की प्रवृत्ति और ऐसी सोच आज की स्थिति के अनुरूप नहीं है। ममता जब मोह में बदलकर संतान हित की आड़ में छीनने की प्रवृत्ति बन जाती है तो वह मानसिक विकृत्ति को जन्म देती है मगर जहाँ तक मैंने पढ़ा है और समझा है...ममता करुणा, दया, प्रेम का उदात्त रूप है जो किसी का अहित कर ही नहीं सकती। यही दया हमें अपनी देवियों में दिखायी पड़ती है और जिस प्रकार माँ दुर्गा आवश्यकता पड़ने पर दुष्टों को दंड देती हैं, उसी प्रकार संसार में जब भी अनाचार और अत्याचार बढ़ता है तो ईश्वर किसी न किसी को चुनकर उसे माध्यम बनाते हैं कि वह मन पर पड़ी धूल को हटाकर सच दिखाए और वह जरूरी नहीं कि आपसे बड़ा ही हो। वह कोई भी हो सकता है, आपके आस - पास। साहित्य भी तो यही करता है और मातृत्व भी इसी राह पर चलकर देवत्व को धारण कर लेता है। कोई आपको जन्म दे, इसका अर्थ यह नहीं कि आप उसकी गलतियों को भी नजरअंदाज करने को अपना कर्त्तव्य मान लें। कहीं न कहीं एक सीमा रेखा खींचनी पड़ती है और जरूरत पड़ने पर कठोर और निर्मम भी बनना पड़ता है। सबसे अधिक कष्ट तब होता है जब बार - बार बताने पर भी कोई अपनी गलती स्वीकार न करे और उसे पारिवारिक हितों के नाम पर न्यायोचित ठहराने लगे। अपने लालच, अहंकार, अत्याचार का दम्भ करे और खुद को मनुष्य नहीं बल्कि कुछ और समझने लगे। उससे भी बुरा तब होता है जब एक स्त्री अपनी समस्त करुणा और विवेक शक्ति की तिलांजलि देकर अपने पक्षपात को सही ठहराने लगती है और अधर्मियों की रक्षा करने लगती है, तब प्रहार करना जरूरी हो जाता है। दरअसल, यशोदा और गांधारी इस दृष्टिकोण से मेरे सामने आती हैं और दोनों एक दूसरे से काफी अलग हैं। यशोदा वह हैं जिन्होंने कृष्ण को जन्म नहीं दिया मगर अपनी ममता से सींचा और श्रेष्ठ बनाया तो दूसरी तरफ गांधारी वह हैं जिन्होंने अपनी पुत्रवधू का चीरहरण करवाने वाले पुत्र की रक्षा के लिए भी शिवभक्ति को ढाल बनाया। अगर गांधारियों को रोका न गया तो संसार की कोई स्त्री सुरक्षित नहीं रहेगी। ममता के नाम पर हम अनाचार को स्वीकृति देते रहे तो इस सृष्टि का क्या होगा और आगे चलकर यह कौन सा विकृत रूप धारण करेगी इसलिए जरूरी है कि समय रहते ऐसी मनोवृत्तियों पर लगाम लगायी जाए। अगर भाइयों द्वारा बहनों के अपमान और उनके अत्याचार को हम स्वीकार करने लगे तो कभी भी संसार में संतुलन नहीं आएगा। यह बताना जरूरी है कि उनकी सीमा क्या है और आज यही करने की जरूरत है। लड़कियों को समझना होगा कि हर एक भाई उसका रक्षक नहीं होता और न ही वह सारी उम्र उसे यह उम्मीद रखनी चाहिए। लड़का हो या लड़की हो, सबको अपने जीवन का युद्ध खुद लड़ना होता है। दोनों को समझना होगा कि न तो वे किसी के भाग्यविधाता हैं और न ही कोई उनका भाग्य विधाता हो सकता है। संयुक्त परिवार को बचाना है तो घर के निर्णयों में छोटे - बड़े सभी की राय लेना और उनको शामिल करना एक दायित्व है....आप मनमानी नहीं कर सकते। चलिए, आज शुरुआत एक कहानी से करती हूँ। कहानी पूर्वांचल के एक गाँव की है जहाँ लड़की का जन्म लेना ही अभिशाप माना जाता रहा है। कहानी 40 -50 साल पहले की है जहाँ एक लड़की ने जन्म लिया...कहते हैं कि उसका मानसिक सन्तुलन ठीक नहीं था मगर क्यों ठीक नहीं था..किसी को नहीं पता। क्या कोई जन्म से ही पागल होता है या परिस्थितियाँ उसे बना देती हैं? मुझे नहीं पता लेकिन बात तो सोचने वाली है कि ऐसा क्या हुआ होगा कि उस लड़की ने मानसिक सन्तुलन खोया होगा और अगर खोया होगा तो उसका उपचार करवाने की कोशिश क्यों नहीं की गयी। खैर...आगे बढ़ते हैं निश्चित रूप से एक तो लड़की और ऊपर से पागल...कौन विवाह करेगा..लड़की के मायके वाले भी उस बोझ से पीछा छुड़ाना चाहते हैं। यह भी तय है कि वह लड़की बड़ी हुई होगी ताने और गालियों का प्रसाद लेकर, उसके मन में भी यह इच्छा रही होगी कि वह किसी भी तरह इस घर से मुक्ति पा सके। निश्चित रूप से ऐसी स्थिति में जब उसका विवाह करवाया गया तो वह उसके लिए मुक्ति का द्वार रहा होगा मगर उसका विवाह धोखे से करवाया जाता है क्योंकि पागल लड़की से कौन शादी करेगा? बहरहाल, लड़की का विवाह होता है और वह ससुराल आ जाती है। यह उसका दोष नहीं है कि उसका मानसिक सन्तुलन सही नहीं है, यह उसके घर वालों की गलती है जिन्होंने उसका विवाह करके पल्ला छुड़ा लिया और उसके बाद वे उसे देखना भी नहीं चाहते मगर सच तो सच है, सामने आता है। जिस घर में आती है, वहाँ पैसा है मगर धन - सम्पत्ति को लेकर होने वाला विवाद भी है। ससुराल में आकर भी इस लड़की को शांति नहीं मिली। स्त्री मानो वस्तु है या बाजार का उत्पाद, डिफेक्टेड निकला और उसका विकल्प खोज लिया गया प्रताड़नाओं का दौर जारी रहा और उस बिचारी के भाग्य में सन्तान का सुख भी नहीं था कि वह पति को बाँध पाती। अब पति तो पति है, खानदान तो खानदान है, उसे तो ऐसी स्त्री चाहिए जो कुल को दीपक दे सके। तो यह उन दिनों सामान्य बात थी कि पति दूसरा विवाह करते। स्त्री के बारे में कौन सोचता है कि जन्म से दुःख सहती और झेलती आ रही स्त्री के भाग्य में ईश्वर सुख का एक टुकड़ा लिखना भी भूल गया। वह पहली पत्नी थी और हिन्दू विवाह अधिनियम के अनुसार कानूनन हर चीज पर उसका हक भी था मगर स्त्री तक कानून की किताबों का लाभ कहाँ तक पहुँच पाता, खासकर तब जब वह निरक्षऱ हो। लड़की कटी, टूटी, तड़पी, कैसे रही,,कोई नहीं जानता, किसी को फर्क भी नहीं पड़ता क्योकि खानदान को चिराग चाहिए...लड़का चाहे जैसा भी हो.. तो पहली पत्नी के होते हुए पति की दूसरी शादी हुई। यह नयी लड़की एक 16 साल की लड़की थी जिसका दिमाग भी सही था, बुद्धि भी बहुत थी और तेज मिजाज भी था...सुन्दर तो थी ही..इतने सारे गुण रहते हुए भी इसने अपनी उम्र से दुगने पुरुष के साथ गृहस्थी बसाने का निर्णय पिता के लिए लिया...फिर वही, नहीं उसके लिए निर्णय ले लिया गया। अब जाहिर सी बात है कि कौन स्त्री है जो अपनी सौत को बर्दाश्त करेगी और जब दूसरी पत्नी ऐसी हो तो पहली पत्नी को कौन पूछता है और कौन सा कानून उसके अधिकारों की रक्षा करता है। कानूनन तो पति महोदय को जेल होनी चाहिए थी। स्त्री के प्रति यह असुरक्षा का ठौर है। सौत का दिमाग खराब रहता था इसलिए घर की जिम्मेदारी और कमान दूसरी पत्नी के हाथ में आ गयी। कहीं न कहीं वर्चस्व की चाह थी और इसमें बाधा थी वह पहली पत्नी.. कई लांछन, कई दोषारोपण...जिसको अपनी सुध नहीं...वह अपने घर की सुध ले भी तो कैसे...उसे कैसे समझ आता कि उसके साथ क्या हो रहा है और क्या होने जा रहा है....जितना सोच रही हूँ...उतनी ही भीगती जा रही हूँ...दुःख से...पीड़ा से...पश्चाताप से....दुःख असहनीय है। दूसरी पत्नी हमेशा असुरक्षा में जीती कि कहीं पहली पत्नी स्वस्थ हो गयी और उसकी जगह दोबारा उसने ले ली तो...? पति को लेकर दूसरी पत्नी पहली पत्नी पर हावी रहने लगी। पहली पत्नी की प्रताड़ना, मार - पीट, शारीरिक हिंसा और तेज हो गयी। आज अपने बच्चों को बड़ों की इज्जत करने वाली उस दूसरी पत्नी को ध्यान भी नहीं आता कि वह जिसको कचरे के पास रहने को विवश कर रही है, वह जिसे मुट्ठी भर भात भी मजदूरों की तरह खटवाकर देती है, वह जिसकी नजर वह अपने बच्चों पर पड़ने भी नहीं देना चाहती थी, वह उम्र में उससे बड़ी थी और सही मायनों में घर उसी का था। संयुक्त परिवार की अपनी परेशानियाँ होती हैं, तो स्वार्थ भी होते हैं....इस लंबे - चौड़े परिवार में उससे काम करवाने वाले बहुत थे मगर प्यार के दो बोल बोलने वाला कोई नहीं था...उसका ख्याल रखने वाला कोई नहीं था। इस बीच दूसरी पत्नी 5 बच्चों की माँ बन चुकी थी। सन्तानें तो उसकी 6 थीं मगर छठीं सन्तान को उसने कभी अपना समझा ही नहीं इसलिए हम उसकी संख्या 5 ही गिनेंगे। समय बीता...संघर्ष भरे दिनों के बीच पति गुजरे। दूसरी पत्नी अब अपनी सौत के साथ थी,,,घर में बहू आ गयी मगर ईश्वर को शायद मानसिक सन्तुलन खो चुकी महिला पर दया आ गयी और वह ऊपर बुला ली गयी। कितना विचित्र है..इतने बड़े खानदान में सिर्फ बँटवारे की सुगमता के लिए इतना बड़ा अन्याय स्वीकार कर लिया जाता है और आज भी सब खामोश हैं। यह कहानी किसी और की नहीं मेरे ही घर - परिवार की है और वह छठीं..अछूत कन्या मैं ही हूँ। मुझे भय है कि इसी तरह माँ को यह लोग खारिज करते रहे तो शायद अगली पीढ़ी और उसके बाद की पीढ़ी कभी जान ही नहीं पायेगी कि इस घर वास्तविक बड़ी बहू और बड़ी दादी कौन थीं। एक स्त्री को उसके अधिकार से वंचित कर प्रताड़ित कर उसकी जगह हथिया लेना, अपनी संतानों के माध्यम से और अपनी बहू - बेटियों के माध्यम से सब कुछ छीन लेना अब तक फिल्मों में देखा था मगर अब जब समझ में आ रहा है तो लग रहा है कि अब तक क्या होता आया है। ऐसी दिखती थीं वह - गोरी थीं...लोग पागल कहते थे....बउराहिन कहा जाता था उनको...चौकोर चेहरा, उन्नत ललाट, सामने के दाँत सोने के थे। हाथ में गोदना था...जिसे वह दिखाती थीं..हँसती थीं तो बहुत अच्छी लगतीं मगर सफाई नहीं थी...इसलिए हर कोई दूर रहता था। इतनी गोरी थीं कि लगातार नहीं नहाने पर भी उनका रंग साफ ही रहता और जब नहला दी जातीं तो दमकने लगता था। बहुत मारा जाता था, कभी लगा नहीं कि घर की मालकिन वास्तव में वह हैं...कभी ऐसा लगने नहीं दिया गया..दिमाग वालों ने उनसे सब कुछ छीन लिया। सबके छोड़े हुए कपड़े....मुट्ठी भर भात और मार...यही तकदीर रही। उनसे सेवा करवाई जाती.....ईश्वर अबकी उनको ऐसा जीवन मत देना...बहुत अन्याय किये हैं तुमने....घर के छोटे - बड़े...सबके लिए उपहास की, परिहास की, तानों की. पात्र रहीं....। तब समझ में नहीं आता था मगर आज मुड़कर देखती हूँ तो लगता है कि यह घर हमेशा से नर्क ही था...नर्क ही है.....घृणा हो रही है...नहीं...घिन्न आ रही है ऐसे जानवरों से... समय किसने देखा है...कौन जानता है कि किसके साथ क्या हो... आज हम मानसिक स्वास्थ्य की बातें कर रहे हैं और उनका चेहरा सामने से हट ही नहीं रहा है। काकी यानी माँ को इस घर में, इस दुनिया में सम्मान दिलाना ही मेरा उद्देश्य है और साथ ही ऐसी मिसाल छोड़ना कि फिर कोई भाई अपने अहंकार के मद में इस तरह के कुचक्र रचने से पहले हजार बार सोचे। कोई महिला अपनी बेटियों को अधिकारों से वंचित करने से पहले याद कर ले कि उसके साथ भविष्य में क्या हो सकता है। लिखते हुए बार - बार ऐसा लग रहा है कि जैसे माँ सरस्वती ही मुझसे यह लिखवा रही हैं और मेरी कलम माँ दुर्गा का त्रिशूल बन गयी है। वह पहली पत्नी मेरे पिता की पहली पत्नी और अब तो लगता है कि शायद मेरी माँ हैं और वह दूसरी पत्नी इस घर की भूतपूर्व मालकिन है क्योंकि उनकी जगह अब उन्होंने अपनी बहुओं को सौंप दी है। यह विरासत क्रूरता, निष्ठुरता, स्वार्थ की भी है और मेरी बड़ी माँ...जिनको हम काकी कहते हैं...मेरे सामने स्त्री उत्पीड़न का जीता - जागता सबूत हैं। मैं जिस कमरे में रहती हूँ...उसी में उनके अंतिम दिन गुजरे। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मुझे किसने जन्म दिया मगर सत्य तो यह है कि काकी माँ के साथ जन्म से लेकर मृत्यु तक अन्याय होता रहा...कहाँ हो ईश्वर? उनको बदमाश और पागल बताने वाले बहुत हैं, जितने लोग - उतनी बातें...मेरी समझ में भी यह बातें बहुत देर से आईं पर आज जब समझ रही हूँ तो आत्मा काँप जा रही है। आखिर क्या दोष था उनका...क्या यह कि वह निःस्हाय, निरपराध स्त्री थीं जो अपनी रक्षा तक खुद नहीं कर पाती थीं और उन पर उनकी छोटी सौत और उनके बच्चे जीवन भर पराक्रम दिखाते रहे। पत्नी का धर्म क्या सन्तान उत्पत्ति है? आप कल्पना कीजिए कि उस औरत पर क्या बीती होगी जब उसे अपना पति बाँटना पड़ा होगा पर क्या वह समझ भी पा रही होंगी कि उनके साथ क्या हो रहा है? मैं जानती हूँ कि मेरी माँ के जीवन में बहुत चुनौतियाँ रही हैं मगर इन चुनौतियों से उनको यह अधिकार नहीं मिल जाता कि वह किसी और का जीवन नष्ट करें इसलिए मुझे फर्क पड़ता है क्योंकि मैं खुद एक स्त्री हूँ। मुझे वह खामोश आर्तनाद दिन - रात परेशान करता है तो आप कैसे इतनी पत्थर हो गयीं कि आपको कुछ भी नजर नहीं आता। एक स्त्री होकर इतनी सारी स्त्रियों के साथ ये इतनी क्रूरता करती रहीं और इनको और इनके बच्चों को रक्ती भर भी न तो शर्म है, न पश्चाताप है बल्कि इनको लगता है कि ये सारी कारगुजारियाँ, इनकी चालाकियाँ सब उनकी उपलब्धि हैं। हम कहाँ जा रहे हैं और कैसा समाज बना रहे हैं? अगर वह बेटे के हित के लिए पक्षपात को उचित मान सकती हैं तो मैं भी एक बेटी का कर्त्तव्य निभा रही हूँ। मेरी माँ मुझे क्यों प्यार नहीं करतीं, क्यों पक्षपात करती हैं..इसका जवाब मैं जिन्दगी भर तलाशती रही हूँ और लगातार तड़पती रही हूँ मगर कोई सिरा नजर आ नहीं रहा था अब दिखने लगा..उन सभी क्रूरताओं के तार जब जुड़ने लगे हैं तो सच मानिए... न तो इनको अपराध का कोई बोध है, न ही उसके प्रति ग्लानि है...अगर मैं इनकी सन्तान नहीं हूँ क्योंकि आज तक इन्होंने न तो सिर पर हाथ रखा, न बेटी समझकर प्यार किया। मेरी परवरिश अपना दायित्व नहीं बोझ समझकर की...और जिस तरह से वह अन्ध पक्षपात करती आ रही हैं, वह पुत्र मोह नहीं कुछ और है....। मेरी और काकी की कहानी में समानता है या यूँ कहिए कि मैं उनका विस्तार भी हूँ और उन पर होने वाले अत्याचारों की प्रतिकार भी हूँ। यहाँ दो बातें हैं...क्यों परिवार के नाम पर किसी भी प्रकार की क्रूरता को प्रश्रय मिले और यह अधिकार प्रताड़क को कौन देता है? इस घर की बड़ी बहू ने इमेज बिल्डिंग खूब की है...सीधे शब्दों में कहें तो शातिर हैं...और दोहरा व्यक्तित्व है इनका। यह वह महिला हैं जिनके साथ, जिनके लिए अपने पूरे परिवार (?) से लड़कर मैंने सब कुछ सहा और यह मेरी जड़ें खोदती रहीं। मेरे साथ होने वाली तमाम साजिशों में बराबर की भागीदार या यूँ कहें कि कुछ हद तक मास्टरमाइंड....जो लोग ननदों को गालियाँ देते हैं.....वह कभी ऐसी औरतों पर भी जरूर बात करें। न तो हर एक ननद विलेन है और न ही हर एक बहू बेचारी...इन्होंने मुझ अनाथ के दिमाग पर कब्जा किया और ऐसा कब्जा किया कि इनका हर पाप मुझे पुण्य ही लगता...ये औरत कभी भी मेरी नहीं थी...मेरे शरीर....मेरे कामकाज....मेरे बाल...मेरी हर चीज को लेकर इतने ताने देती रही हैं कि मेरा खुद पर से विश्वास हटने लगा था...मैं अपने ही घर में एक बिस्कुट भी लेने के लिए इनका मुँह ताकती...मेरे कपड़े....मेरा हर सामान ये हक से लेतीं और मायके में दान भी कर आतीं और तारीफें लूटतीं मगर मेरी पीठ में सबसे गहरा खंजर मारने वाली भी यही हैं। मुझे नजरबंद करने में इनकी भागीदारी थी...टाइमिंग ऐसी थी कि ये कोलकाता में ही नहीं थी...मुझ पर हाथ उठाने में....मुझे मानसिक रूप से प्रताड़ित करने में सबसे आगे रही हैं। इन्होंने मुझे घर से निकलवाने की और कमरे पर कब्जा करने की पूरी मुहिम छेड़ी और पिछले साल तो लगभग सफल हो भी गयी थीं...लेकिन कहते हैं ....जाको राखे साइयां....। मेरा खाना, पहनना ...सब खलता है और इतना खलता है कि मेरे साथ कुछ भी अच्छा हो तो पूरे घर में मातम छा जाता है....मानसिक विकृति इसे कहते हैं और उपचार की जरूरत भी ऐसे लोगों को ही है। आप क्या ऐसी औरतों को सशक्त करना चाहते हैं? इनको उखाड़कर फेंक देने की जरूरत है। पति का साथ देना और वफादारी साबित करना आपको उसके अपराधों का साथ देने की अनुमति नहीं देता। कई बार ऐसा लगता है कि पूरे घर में फुटबॉल मैच चल रहा है। भारतीय परिवारों में बात जब स्त्री की होती है तो दायरा, माँ, बेटी, पत्नी तक ही सिमट जाता है। यह एक सत्य है। पुरुष शासित इस समाज में खुद जननी कही जाने वाली स्त्री की सोच और लक्ष्य में भी पुरुष सन्तान ही है। हम मानें या न मानें लेकिन सत्य यही है कि खुद स्त्रियों की सोच के केन्द्र में पुरुष के हित ही होते हैं, फिर वह पति हो, भाई हो या पुत्र हो, और इसे लेकर वह इतनी केन्द्रित हो जाती है कि वह कब क्रूरता, स्वार्थ, पक्षपात की सीमा पार कर जाती है, खुद उसे पता नहीं चलता है और मेरा जीवन खुद इसका सजीव दृष्टांत है। पुरुष ही नहीं, स्त्री भी अपने अहं की तुष्टि चाहती है और इस मार्ग में बाधक खुद उसकी अपनी कन्या सन्तान हो, तो वह उसकी भी शत्रु बन सकती है। उसकी सारी सोच, उसकी हर एक गतिविधि के केन्द्र में उसके पुत्रों और पुत्रवधुओं के लिए ही जगह बचती है। वह अगर अपनी बेटी को स्नेह देने का थोथा प्रयास भी करती है तो उसके केन्द्र में बेटी के प्रति ममता नहीं बव्कि समाज में पुत्र की प्रतिष्ठा की चिन्ता रहती है, मेरे मामले में यह सत्य साबित हुआ है। अगर विवाह और मातृत्व किसी को इतना निष्ठुर बनाता है तो मैं सौभाग्यशालिनी हूँ कि मैंने विवाह नहीं किया। आस - पास कुछ तस्वीरें हैं और यह वह सत्य है जिसे स्वीकारने में खुद मुझे 40 साल लग गये। मैं वह हूँ जो लड़ती रही जिन्दगी भर स्त्री के रूप में इस घर में कदम रखने वाली बहुओं के अधिकारों के लिए , आने वाली पीढ़ी की लड़कियों के जीवन को सुरक्षित बनाने के लिए, खुद से प्रेम करना ही नहीं बल्कि अपना सम्मान करना भी भूल गयी। निःस्वार्थ प्रेम का उत्तर मुझे षडयंत्रों से मिला। हम किस प्रकार की स्त्रियों के लिए लड़ रहे हैं...........क्या ऐसी स्त्रियों के लिए? मैंने सब कुछ स्वीकार किया, यह गलत था, मेरे साथ जब भी कुछ गलत हुआ मैंने खुद को समझाया, क्योंकि सम्भवतः मैं अपने विश्वास को टूटते देखना नहीं चाहती थी मगर मेरा विश्वास गलत लोगों पर था इसलिए टूटना ही था मगर मेरे विश्वास के केन्द्र में सर्वशक्तिमान था, ईश्वर था और उसने मुझे कभी नहीं टूटने दिया। आज खुद को देख रही हूँ तो आश्चर्य़ होता है, मैं कहाँ छिपी थी इतने सालों तक....मुझे अच्छा लग रहा है, मैं खुद से मिल रही हूँ। काफी कुछ कहा गया है मेरे बारे में... अब समय आ गया है कि मैं भी कुछ कहूँ क्योंकि अभिव्यक्ति अधिकार तो मेरा भी है। कोई भी विमर्श बहनों को लेकर नहीं होता और न ही भाइयों के उत्पात और माताओं के पुत्र मोह में छिपे पक्षपात पर ही कोई अंकुश लगाता है इसलिए अपने लिए कई बार हथियार उठाने ही पड़ते हैं और मेरे पास तो लेखनी ही मेरा बल है। प्रताड़ना और स्वार्थ का गहरा रिश्ता है और शिक्षा का मतलब डिग्री ही नहीं होता। पितृसत्ता का लाभ उठाने वाली शिक्षित स्त्रियाँ सबसे बड़ा खतरा हैं। आप ऐसी स्त्रियों से आने वाली पीढ़ी को कैसे बचाएंगे? जब सामाजिक प्रतिष्ठा और सम्पत्ति की चाह मानवता पर भारी पड़ जाए तो व्यक्ति मनुष्य नहीं रहता, वह राक्षस और मनोरोगी बन जाता है और राक्षसों को तो दंड मिलना ही चाहिए। पिछले साल जब फेसबुक पर अपनी कहानी अन्ततः बतायी तो बहुत स्नेह मिला, चिंता भी मिली मगर परिवर्तन य़हाँ नहीं था, परिवर्तन मुझमें हुआ। हाँ, वह बहुत नाजुक समय था। तबीयत बहुत बिगड़ गयी थी मगर माँ की ममता तब भी नहीं थी, आज भी नहीं है और मैं किसी पत्थर के साथ नहीं रह सकती। मेरे जीवन को नर्क बनाने में पुरुषों के साथ स्त्रियों का जबरदस्त योगदान हैं और इनमें सिर्फ अशिक्षित ही नहीं बल्कि वह स्त्रियाँ भी हैं जो शिक्षित हैं, नौकरी कर रही हैं तो पितृसत्ता की पोषक इन क्रूर और स्वार्थी स्त्रियों को दंड क्यों नहीं मिलना चाहिए? जिस लड़की ने पिछले 18 - 20 साल से कुछ लिया ही नहीं, उसे उसके ही घर में भिखारी बताया जा रहा है, उसका चरित्र हनन किया जा रहा है, आखिर मुझे क्यों अहंकारियों के साथ रहना चाहिए? स्त्री की अपनी अस्मिता होती है मगर उसकी तथाकथित जननी उसे अपने पुत्रों की दासी बनाने को आतुर हो और खुद अपनी पुत्रवधु के हर अपराध की संरक्षिका हो तो उसे माँ का सम्मान मिलना ही क्यों चाहिए? मानसिक तौर पर बीमार कौन है? आज जब इनके होते मेरी यह अवस्था है तो भविष्य में क्या होगा? पहले तो आर्थिक तौर पर और अब भोजन के स्तर पर अपनी शक्ति का उपयोग अपनी ही कन्या को झुकाने, गिराने और हराने के लिए मेरे गिरने की राह देखते हैं जिससे मैं गिरूँ तो मुझे गिराने वाले अपनी महानता का ढिंढोरा समाज में पीटें और बताएं कि किस तरह उन्होंने मुझ पर अहसान किया... आज मुझ जैसी आत्मनिर्भर लड़की के साथ यह हो रहा है और लोग तमाशा देख रहे हैं तो कल्पना कीजिए जो लड़कियाँ आर्थिक रूप से पराधीन हों...उनके प्रति किस तरह की क्रूरता होती होगी इसलिए जरूरी है कि अब इस कहानी का अंत किया जाए। आज पीछे मुड़कर देख रही हूँ तो एक के बाद एक करके सारे परदे गिरते समझ आ रहे हैं। इनको घर में लड़की इसलिए चाहिए ताकि उनकी खोखली प्रतिष्ठा को आँच न पहुँचे और लड़की को उसका हिस्सा न देना पड़े। इसके लिए ऐसे घटिया लोग स्त्रियों का उपयोग करने से नहीं हिचकते। इनको किसी से कोई प्रेम है ही नहीं। मेरे कमरे में अतिक्रमण था, इसके लिए फर्नीचर से लेकर पुराने कपड़े चक..यहाँ तक कि कपड़े सुखाने वाली रस्सी तक भी इनका ही अधिकार रहा जिसे अब मैंने जाकर तहस - नहस किया है। इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि मेरे कमरे में दिसम्बर की कड़ाके की ठंडी हवा आती है और मुझे अस्थमा है। टूटा फर्नीचर, फटे गद्दे, जंग लगी आलमारी...और रंग छोड़ती दीवारें...क्या किसी घर की बेटी इसकी हकदार है...यह प्रश्न है मेरा सबसे..क्या 40 वर्षों से जिस तरह का मानसिक उत्पीड़न मैं झेल रही हूँ...उसकी भरपाई हो सकेगी..क्या जो बचपन मैंने तड़पकर. बिलखकर...रोकर गुजारा..क्या वह मुझे वापस मिल सकता है।
जिस व्यक्ति ने मुझे जलील किया...वह उसे गले लगाती हैं...कमरे का टूटा ट्यूबलाइट होल्डर....दफ्तर का टूटा फर्नीचर ...यह स्थिति मुझे सजा देने के लिए है....आखिर कौन हैं ये लोग...जो मेरी तकदीर का फैसला करेंगे..यह कौन है जो मुझे सजा देगा, घर में नजरबंद करेगा, मेरी नौकरी छुड़वाएगा और मेरे हर काम में बाधक बनकर गालियाँ देगा...यह जो कुछ हुआ और हो रहा है...इसके पीछे यही प्रश्रय है..मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह किसे मानती हैं मगर संसार में किसी को भी यह अधिकार नहीं कि वह अपने मोह और अपने स्वार्थ के लिए मेरा जीवन दांव पर लगा दे...मगर खुद को मेरी माँ कहने वाली औरत ने यह किया और मैं उनको प्रेम नहीं दे सकती। साहब, कानून शायद आप नहीं जानते तो बता दूँ कि जिसे आप अर्जित सम्पत्ति और खून - पसीने से संचित कमाई बता रहे हैं, वह जिस जमीन पर है, वह आपने खरीदी नहीं है बल्कि हिस्से के नाम पर आपको दी गयी है..और वह संयुक्त परिवार से मिली है। आपके सौभाग्य से या दुर्भाग्य से आप जिस पिता की संतान हैं, उनकी संतान भी मैं हूँ और जिस प्रकार आप अधिकार जता रहे हैं, वह अधिकार मेरा भी है और इस देश के सर्वोच्च न्यायालय ने, संविधान ने जो अधिकार मुझे दिये हैं, मेरे पिता की विरासत से जो अधिकार मेरे हैं, वह आप क्या, कोई मुझसे छीन नहीं सकता। इस पर आपका फार्मूला आप भी लागू किया जाए तब तो आप लोगों को फूटी कौड़ी भी नहीं मिलनी चाहिए क्योंकि सब तो बाबूजी और मेरे भी पिता जी ने खड़ा किया है...फिर इतनी हाय - तौबा किस लिए। रही बात औकात की तो इन्सान की औकात...दो मुट्ठी राख से ज्यादा नहीं है। कितना भी हम उड़ लें लेकिन परिणति वह है कि किसी छोटे से घड़े में समा जाएंगे और भाग्यवान हुए तो नदीं में बहा दिए जाएंगे। तो इस बात का गुमान क्या करना...हाँ इतना जरूर है कि ईश्वर ने अगर संसाधन दिये हैं तो मानव कल्याण के लिए उसका उपयोग हो और हम लोग तो निमित्त मात्र हैं। आपकी सम्पत्ति से अभी तीन हिस्से निकले हैं जबकि 6 निकलने चाहिए....बाकी 2 का पता नहीं..पर मैं तो हूँ। वैसे आप लोगों का पूरा जीवन ही छीनने और खसोटने के साथ, साजिशों और धोखाधड़ी में गुजरा है। आप जिस विशाल इमारत के मालिक होने का दावा करते हैं, वह आपने नहीं बनवायी है और सच तो यह है कि सम्पत्ति ही आपका अस्तित्व है, क्योंकि सम्पत्ति, विशाल मकान न हो तो कोई आपको क्यों पूछेगा...आपको ही क्यों, आप जिनका नेतृत्व कर रहे हैं, उनको भी कोई नहीं पूछेगा। आप लोगों का फॉर्मूला आतंक से शुरू होता है और भय पर समाप्त होता है। जब कोई कमाई होती नहीं तो इतना पैसा कहाँ से आता है कि आप सपरिवार कभी पहाड़ों में जाते हैं, तो कभी समन्दर में छुट्टी बिताते हैं और आपकी जीवन शैली से लेकर आपका व्यवहार ऐसा है कि आप किसी सम्राट के घर में पैदा हुए हैं। अपने मेहमानों को जब बंगला दिखाते हैं तो यह कमरा भी दिखाना चाहिए था, आपने नहीं दिखाया तो यह नेक काम अब हम कर दे रहे हैं। आपकी पत्नी के मामा जी को क्या यह अधिकार था कि वह मुझे लेकर फैसला सुनाते...हर बात पर पंचायत बुलाने वाले आप..मेरी फीस खा गये...अब मेरे नाम पर मुझे अपना आश्रित दिखाकर आयकर पर मित्र के सहयोग से छूट ले रहे हैं...मतलब गिरने की कोई सीमा है कि नहीं...न मुझे आपसे मतलब, न आपको मुझसे मतलब...आप जो राजनीति करते हैं...वह राजनीति भी हमने खूब देखी है। मतलब आप लोग मुझे क्या समझते हैं उसका तो प्रत्यक्ष प्रमाण है। आपने मुझे भिखारी बताया तो इसका कारण तो यही है कि आपने जब सब कुछ हड़प लिया तो भिखारी तो होना ही है। समस्या यही है...बहनों को खारिज कर देना, उनके अधिकार को स्वीकार न करना और उनको हाशिये पर डाल देना। जो महिला एक फूटी कौड़ी भी न कमाती हो, उसका दावा है कि वह मुझे 29 साल से पाल रही हैं, प्रगति तो आपने बहुत की है...डायरी चुराने से लेकर सब्जी चुराने तक का लम्बा सफर तय किया है। यदा - कदा आलमारी पर भी हाथ साफ कर ही देती हैं। आपकी बेटियों के बहुत से शौक पूरे किये और आपके लिए तो हमेशा लड़ ही लेती रही मगर क्या आप इतना कमा लेती हैं कि आप खुद का भी पेट पाल सकें, मुझे पालना तो दूर की बात है। रात के 10 बजे ऑफिस में रहते हुए भाग - भागकर आपकी फरमाइशें पूरी की हैं। आपकी बेटी के लिए आपके साथ 11 बजे तक सड़क पर भी बैठी हूँ। समस्या यह है कि घर के बेटे और बहू खुद को घर का सदस्य नहीं, बल्कि मेरा मालिक मान बैठे हैं और अब उनके इस भ्रम का निराकरण बहुत आवश्यक है। चार्ट्ड अकाउंटेंट की जिम्मेदारी क्या है..क्या यह कि वह दोस्ती के नाम पर आयकर की चोरी में दोस्ती के नाम पर साथ दे? मेरी आयकर की फाइल में स्पष्ट है कि मेरा खर्चा यह घर नहीं चलाता मगर मुझे आश्रित दिखाकर आयकर छूट का लाभ लेने वाला व्यक्ति जितना दोषी है...मेरे अधिकार के धन को कमिशन के नाम पर खाने वाला दोषी ही नहीं बल्कि अपने पेशे के प्रति भी बेईमान है। क्या ऐसे लोगों पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए..? चाहे तो मेरे बैंक खाते की जाँच की जा सकती है। मैं अनुरोध करती हूँ चार्टेड अकाउंटेंट्स की संस्था से कि वे ऐसे प्रोफशनल्स का लाइसेंस रद्द करें जो इस तरह की धोखाधड़ी करते हैं। पता नहीं आपके जैसे लोगों ने कितनी बहनों और बेटियों का हक खाकर अपना बंगला बनवाया है। माँ अगर विश्व की सबसे बड़ी शक्ति है तो उसे पक्षपात का अधिकार है ही नहीं। उसे कोई अधिकार नहीं कि अपने पुत्रों के लालच, अहंकार और खोखली प्रतिष्ठा के लिए वह अपनी बेटी का भविष्य, उसका जीवन...सब बेटों के चरणों में डालकर उस बेटी की दुर्दशा की भागीदार बने....ये शब्द बड़े कठोर हैं मगर सत्य तो यही है कि वह भी उस अपराध में भागीदार है, मैं क्यों उनके साथ रहूँ जिनको न मुझसे प्रेम है, न परवाह है। स्थिति यह है कि अपना खर्च उठाते हुए मैं सब्जी खरीदती हूँ और इनके फ्रिज से वह किराये के रूप ले ली जाती हैं। मैंने बहुत सहा, अब नहीं..मेरे पास फ्रिज नहीं है तो सब्जी खराब भी होती है...पहले लेती थी और सब्जी खरीदने लगी तो रखती थी मगर देखिए मैं इन लोगों की तरह करोड़पति नहीं हूँ...अगर यह रोज - रोज ऐसे करेंगी तो मेरा खर्च कैसे चलेगा? अब मैं हर रोज मिर्च और प्याज के लिए लड़ तो नहीं सकती न....मेरा एक स्टैंडर्ड है तो मैं हट गयी...और यही लोग चाहते भी थे। अगर परिवार के नाम पर आप स्त्री होने के कारण किसी के साथ होने वाला अन्याय इसलिए स्वीकार करते हैं कि उससे आपके हितों को चोट न पहुँचे तो आप किसी भी सद्भावना के अधिकारी नहीं। अगर आपने इस घर में दशकों से होते चले आ रहे अन्यायों पर चुप्पी साधे रखी और तमाशा देखा तो एक और तमाशा देखने में आपको दिक्कत नहीं होनी चाहिए। जब घर की बेटी के अपमान से, वंचना से किसी खानदान को कोई फर्क नहीं पड़ता, जब उसका सम्मान किसी आपके परिवार का सम्मान नहीं है तो उसकी प्रतिक्रिया पर भी आपको आपत्ति नहीं होनी चाहिए। जो परिवार, समाज और देश स्त्री का सम्मान नहीं कर सकता, उसका पतन ही उसकी नियति है। आर्थिक अभाव ने भी मुझे मजबूत बनाया, मेरा कमरा उनको महल लगता है, आज इसी कमरे की झलकियाँ आपको देखनी चाहिए...कहना सिर्फ इतना ही है कि इस परिवार से अब मेरा कोई सम्बन्ध नहीं, आप काकी की सन्तान को देखना नहीं चाहती थीं...माँ वह नहीं जो जन्म दे, माँ वह है जो समझती है..आज आपकी सभी सन्तानों कहीं आगे हूँ। यही ईश्वर का न्याय है कि आज आप लोगों को अपने ही घर में चोरों की तरह रहना पड़ रहा है। अब मैं काकी के लिए कुछ करना चाहती हूँ जिससे उनको वह सम्मान मिले जिसकी वह हकदार थीं। कभी हिम्मत हो तो खुद को देखिएगा...आप क्या रही होंगी और आपने खुद को क्या बना लिया। एक स्त्री होकर भी आपके अन्दर जरा भी करुणा नहीं तो किसी को आपसे सहानुभूति या प्रेम क्यों हो? एक ट्रस्ट बनाने की इच्छा है जो उनके नाम पर हो और यह ट्रस्ट युवाओं, महिलाओं के साथ मानसिक तौर पर विक्षिप्त लोगों के लिए कुछ काम कर सके...शायद यही प्रतिकार है और कर्तव्य भी।

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