भोजपुरी गीतों में परंपरा के नाम पर अपनी गलीज सोच का परिचय मत दीजिए...या तो पलंग ही तोड़ेंगे, घाघरा के ऊपर और नीचे ही देखेंगे या फिर आगे बढ़ने वाली लडकियों पर कुंठा ही निकालेंगे श्रीमान मनोज तिवारी जैसे गायक आखिर हिन्दी प्रदेश को अंधकार में क्यों रखना चाहते हैं, क्यों नहीं चाहते कि पुरुष थोड़ी बुद्धि के साथ हृदय भी रखें....? आप जैसे लोग समाज के, देश के असली दुश्मन ही नहीं देश द्रोही भी हैं...समाज की आधी शक्ति को अपने स्वार्थ के लिए दबाकर रखना , देश को पीछे ढकेलना है.. इसकी लोकप्रियता बताती है कि अशिक्षित और कुंठाग्रस्त लोगों की तादाद कम नहीं हुई...इस गीत का विरोध पुरजोर होना चाहिए बल्कि प्रतिबंधित होना चाहिए.. पर आपके गीत का जवाब आपको मिलेगा और आपके ही अंदाज में मिलेगा, लिखने और गाने वाले आप ही नहीं...विद्या और ज्ञान की देवी समानता सिखाती हैं...कुंठा और अहंकार से निकले शब्द टिकते नहीं.... शहर की हवा ने विवेक दिया है, पँख दिए हैं जिनको तमाम ताकत के बाद भी आप छीन नहीं सकते ...वैसे हम जंगल में भी रहेंगे तो अपने पंख उगा ही लेंगे... आप अपनी शर्ट पर बटन लगाना अपने लिए एक कप चाय बनाना ही सीख लीजिए....हद है जो अपने भोजन से लेकर कपड़ों तक के लिए दूसरों के आसरे है...जो अपनी लंबी उम्र के लिए दूसरों से भूखे रहने की उम्मीद पाले है वो लिजलिजा पुरुष खुद को सर्वशक्तिमान समझता है...खोखले बर्तन हैं आप जैसे लोग और सम्वेदनशील लोगों के लिए मुसीबत भी आप लिखिए...आपके लिखे और ऐसी घटिया सोच का हर बार उत्तर मिलेगा... क्या किसी के लिए कुछ करने का मतलब यह है कि आपने उसे खरीद लिया है, ज्योति मौर्य पर कुछ भी कहना जल्दबाजी है क्योंकि सोशल मीडिया से सच का पता नहीं चलता पर यही काम पुरुष हमेशा से करते आ रहे हैं, ऐसे कई पुरुषों को देखा है जो संघर्ष के दिनों में पत्नी के साथ रहते हैं और सफल होने पर, पढ़ - लिख जाने पर छोड़ देते हैं, ऐसे लोगों को आपका समाज मान्यता भी देता है.. .तब आपके संस्कार कहाँ जाते हैं? क्या मुन्शी प्रेमचंद ने पहली पत्नी के होते हुए शिवरानी देवी से विवाह नहीं किया? क्या धर्मेंद्र, आमिर खान, अजहरुद्दीन, मुलायम सिंह और हमारे आस-पास पास के लोगों ने ऐसा नहीं किया? तब आपका समाज कहाँ गया था? कई स्त्रियां भी इसमें शामिल हैं और मैं उनको सही नहीं ठहरा रही , और आप स्त्री को लेकर कोई दया नहीं रखते दरअसल पुरुष स्त्री को छोड़ दे, यह आपके लिए सामान्य बात है, आपको तकलीफ इस बात की है कि अब कि स्त्री ने पुरुष को छोड़ दिया है...पहले दोनों की बातें सुनिए तो सही दुःख जाने का है कि सोने की मुर्गी हाथ से निकलने का है क्योंकि सर्विस वाली बहू भी चाहिए ... दिक्कत य़ह है कि आपके अंदर में जो पुरुष बैठा है, उसे स्त्रियां अभी भी अपनी गुलाम लगती हैं, वो खुद को अभी भी परमेश्वर वाली कैटेगरी से नीचे उतार नहीं पा रहा, जो उतर गए वो तो परम सुखी हैं, और जो नहीं उतर पा रहे वो भी सोच रहे हैं...चिड़िया उड़ कैसे गयी.. वो खुद उड़ने की कोशिश नहीं कर रहे, बस हाथ में कैंची और ज़ंजीर लिए घूम रहे हैं उतर जाओ....भाई...वर्ना जंजीर तुम्हें ही जकड़ेगी और कैंची तुम्हारे सपनों पर चलेगी ,,, मत कीजिए अहसान हम पर...हमारी संपत्ति का हिस्सा दे दीजिए....आखिरकार पैतृक संपत्ति, स्त्री धन ये तो स्त्री के ही हैं न हम अपना ध्यान रख लेंगी.. प्रेम और अहसान एक साथ नहीं रहते ...अगर जरूरत हमारी थी तो जरूरत आपकी भी थी... हिंदी के मूर्धन्य लेखक 'मुर्दहिया' और 'मणिकर्णिका' जैसी प्रसिद्ध आत्मकथाओं के रचनाकार, प्रोफेसर डॉ. तुलसीराम जी की पहली पत्नी। प्रोफ़ेसर तुलसीरामजी से इनका बाल विवाह 2 साल की उम्र में हो गया था। 10-12 साल की उम्र में जब कुछ समझ आई तो इनका गौना हुआ। उस समय तक तुलसीराम जी मिडिल पास कर चुके थे। घर में विवाद हुआ कि तुलसी पढ़ाई छोड़ हल की मूठ थामें। पढ़ने में होशियार तुलसीराम को यह नागवार गुजरा और उन्होंने इस सम्बंध में अपनी नई-नवेली पत्नी राधादेवी से गुहार लगाई कि वह अपने पिता से मदद दिलायें, जिससे उनकी आगे की पढ़ाई पूरी हो सकें। राधादेवी ने अपने नैहर जाकर यह बात अपने पिता से कही और अपने पिता से तुलसीरामजी को सौ रुपये दिलवाए। इस प्रकार पत्नी के सहयोग से निर्धन और असहाय तुलसीराम की आगे की पढ़ाई चल निकली। ...पति आगे चलकर अपने पैरों पर खड़ा हो जाएगा, उन्हें सुख-साध देगा युवा राधादेवी ने अपने सारे खाँची भर गहने भी उतारकर तुलसीराम को दे दिए, जिनसे आगे चलकर तुलसीरामजी का बनारस विश्वविद्यालय में एडमिशन हो गया। पिता और 5 भाइयों की दुलारी राधादेवी के पति का भविष्य उज्ज्वल हो, इस हेतु राधादेवीजी के मायके से प्रत्येक माह नियमित राशन-पानी भी तुलसीरामजी के लिए भेजा जाने लगा। ससुराल में सास-ससुर देवर-जेठ और ननद-जेठानियों की भली-बुरी सुनती सहती अशक्षित और भोली राधादेवी, संघर्षों के बीच पति की पढ़ाई के साथ-साथ अपने भविष्य के भी सुंदर सपने बुनने लगीं थीं। उधर शहर और अभिजात्य वर्ग की संगत में आये पति का मन धीरे-धीरे राधादेवी से हटने लगा। गरीबी में गरीबों के सहारे पढ़-लिखकर आगे बढ़ने वाले तुलसीराम को अब अपना घर और पत्नी सब ज़ाहिल नज़र आने लगे। शहर की हवा खाये तुलसीराम का मन अंततः राधादेवीजी से हट गया। बीएचयू के बाद उच्चशिक्षा हेतु तुलसीरामजी ने जेएनयू दिल्ली की राह पकड़ ली, जहाँ वह देश की उस ख्यातिलब्ध यूनिवर्सिटी में पढ़ाई और शोध उपरांत, प्रोफ़ेसर बने और समृद्धि के शिखर तक जा पहुँचे। प्रोफ़ेसर बनने के उपरांत तुलसीरामजी ने राधादेवी को बिना तलाक दिए अपने से उच्चजाति की शिक्षित युवती से विवाह कर लिया और फिर मुड़कर कभी अपने गाँव और राधादेवी की ओर देखा!!! राधादेवी आज भी उसी राह पर खड़ी हैं, जिस राह पर प्रोफ़ेसर तुलसीराम उन्हें छोड़कर गए थे। जिस व्यक्ति को अपना सर्वस्व लुटा दिया उसी ने छल किया, इस अविश्वास के चलते परिवार-समाज में पुनर्विवाह का प्रचलन होने पर भी राधादेवी ने दूसरा विवाह नहीं किया। भाई अत्यंत गरीब हैं। सास-ससुर रहे नहीं। देवर-जेठ उन्हें ससुराल में टिकने नहीं देते कि ज़मीन का एकाध पैतृक टुकड़ा जो तुलसीरामजी के हिस्से का है, बंटा न ले इसलिए वे उन्हें वहाँ से वे दुत्कार देते हैं। ...कुछ साल पहले जब तुलसीरामजी का निधन हुआ तो उनके देवर-जेठ अंतिम संस्कार में दिल्ली जाकर शामिल हुए, पर राधादेवी को उन्होंने भनक तक न लगने दी! बहुत बाद में उन्हें बताया गया तो वे अहवातिन से विधवा के रूप में आ गईं, उनके शोक में महीनों बीमार रहीं देह की खेह कर ली किसी ससुराली ने एक गिलास पानी तक न दिया!! बेघरबार राधादेवी आज ससुराल और मायके के बीच झूलतीं दाने-दाने को मोहताज़ हैं!!! अगर जरा भी आत्मसम्मान हो तो जिनके पति कोचिंग छुड़ाकर घर बैठा रहे हैं, वो औरतें घर और पति को ठोकर मार दें, पढ़ी -लिखी हैं अपना खर्च उठाएं और आज कल तो सरकारी मदद मिलती है खुद पर फोकस करें, और अपने सपने हर हाल में पूरे करें, पिता - भाई- पति- बच्चों के भावनात्मक चक्रव्यूह से बाहर निकलिये , दहेज, स्त्री धन, सब वापस लीजिए, जितने साल रहीं, उसका मुआवजा लीजिए, क्योंकि आत्मसम्मान नहीं तो कुछ नहीं ये वो समय है जब आपको पैतृक संपत्ति का हक मांगने के लिए आवाज उठानी चाहिए .. क्योंकि तब आप पर कोई अहसान नहीं जता सकेगा, अपनी बेटियों के लिए पिता यह कर सकता है क्योंकि भाई तो अधिकतर मामलों में आपका आगे बढ़ना शायद ही पचा पायेंगे, हालांकि अब सुखद रूप से अपवाद हो रहे हैं पर यह संख्या न के बराबर है ये जो हो रहा है, वो देते जाने और सिर पर चढ़ाने का नतीज़ा है अब और अग्नि परीक्षा नहीं, ठोकर मारना सीखिए , कई बार शक्ति दिखानी पड़ती है अच्छे खासे दोस्त को बॉयफ्रेंड और प्रेमी बना दो, यह भी षड्यंत्र का हिस्सा है... स्त्री जब पुरुष की मित्र हो सकती है , आप यह स्वीकार कर लेते हैं तो पुरुष स्त्री का मित्र हो सकता है, ये आपको स्वीकार क्यों नहीं? कहने का मतलब यह कि द्रौपदी कृष्ण की सखी है, राधा सखी है तो उत्तम मगर द्रौपदी के लिए कृष्ण को भाई ही बनना होगा, राधा के लिए प्रेमी ही बनना होगा, काहे ??? दोष आपमें है, आपकी नजर में है और गंदगी दूसरों में खोजते हैं और उड़ती चिड़िया को उड़ता देख दाह में जल रही पिंजरे की मैना इस आग में जमकर घी डालती है

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