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पितृसत्ता नहीं, मातृसत्ता ही रही है भारत की शाश्वत परम्परा

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भारत में मातृ सत्ता को हमेशा से महत्व दिया गया है..अगर प्राचीन भारत पर दृष्टि डालें तो देवियों और मातृ शक्ति को दर्शाने वाले कई मंदिर और यत्र - तत्र प्रतिमाओं में बिखरा इतिहास गवाही देता है। एक खास बात यह कि मातायें आज की तरह निरीह, निर्भर और करुणा तक सीमित नहीं होती थीं बल्कि उनकी प्रशासनिक व आर्थिक स्तर पर समाज में भागीदारी होती थी। ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ स्त्रियों ने अपनी संतानों को अकेले बड़ा किया...यहाँ तक कि मध्यकालीन भारत में भी आपको ऐसे उदाहरण मिलते हैं मगर यह सत्य है कि इस मातृसत्तात्मक परम्परा को हाशिए पर डाला गया और धीरे - धीरे स्त्रियों के जीवन पर पितृसत्ता का आधिपत्य हुआ।  यहाँ तक कि प्राचीन भारत में स्वयम्बर अथवा विवाह विच्छेद का अधिकार भी स्त्रियों को प्राप्त था मगर सभी जानते हैं कि आज के युग में स्त्रियों की स्थिति क्या है और एक बार फिर धीरे - धीरे स्त्रियाँ जागरुक हो रही हैं, यह अच्छी बात है और सरकारी स्तर पर सहयोग मिल रहा है। यह अच्छा है मगर अब समय आ गया है कि मातृत्व की छवि और परिभाषा को संतुलित किया जाए। सिर्फ करुणा और निर्भरता के आधार पर स्वस्थ...

समाज की जरूरत हैं प्रसाद की मुखर स्त्रियाँ और उनके प्रश्न

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सुषमा कनुप्रिया जयशंकर प्रसाद हिन्दी साहित्य की निधि हैं और उनका साहित्य समाज की धरोहर। छायावाद का उत्कर्ष उनकी रचनाओं में दिखता है और 'कामायनी' इस उत्कृष्टता का शिखर। राष्ट्रवाद का उत्कर्ष देखना हो तो प्रसाद के समूचे साहित्य में वह भरा पड़ा है। प्रसाद इतिहास के शिलालेख पर संवेदना से समाज को समेटते हुए लिखते हैं मगर मुझे लगता है कि स्त्री के सन्दर्भ में कामायनी उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति नहीं है अपितु इसका शिखर तो 'ध्रुवस्वामिनी' में दिखता है जो पहले प्रकाशित हुई थी। यह आश्चर्य की बात लगती है कि एक ही व्यक्ति के दो रूप उसके साहित्य की दो अलग विधाओं में दिखते हैं। अगर कामायनी की बात की जाए तो वे नारी को श्रद्धा कहते हैं, प्रकृति का रूप बताते हैं मगर पुरुष के प्रतिकार का सामर्थ्य वे उसे नहीं देते हैं जबकि मनु गर्भवती श्रद्धा को छोड़कर चल देता है। वह इड़ा के प्रश्रय में रहता है और उसके साथ उसकी प्रजा पर भी अत्याचार करता है, इसके बावजूद इड़ा को बुद्धि और पश्चिम की बताकर प्रसाद उसे उपेक्षित करते हैं....यह बात बड़ी अजीब लगती है कि तमाम प्रताड़नाओं के बावजूद श्रद्धा मनु को...

हर वहशी अपराध का अंत तो हमारे हाथों से ही होना है

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हर बार कोई निर्भया या आसिफा शिकार होती है, हर बार मोमबत्तियाँ गलायी जाती हैं और हर बार रैलियाँ निकाली जाती हैं। ये कोई नयी बात नहीं है। अपराधियों की सजा की माँग पर सोशल स्टेटस शेयर किये जाते हैं और नेता इस पर अपनी गोटियाँ फिक्स करते हैं। इस पर तब कहाँ थे, टाइप लोग और भी वीभत्स तस्वीरें लाते हैं और पुरानी गलतियों से सीखने की जगह नयी गलती और अपराध को ढकने की कोशिश करते हैं। अच्छा, जरा सोचिए तो ये बलात्कारी पैदा कहाँ से होते हैं? बलात्कार के नाम पर बेटिय़ों को मारने वाले स्टेटस जो चिपका रहे हैं, वह उसी पुरानी हताशा को सामने ला रहे हैं, मारना है तो अपराध को मारिए क्योंकि अपराधी तो रक्तबीज की तरह हैं, एक को मारियेगा...10 और पैदा होंगे। अपराधी को सजा जरूर दीजिए मगर उससे भी जरूरी है कि अपराध को ही जड़ से खत्म किया जाये और इसके लिए फाँसी के अलावा बहुत कुछ करने की जरूरत है। इसके लिए हर स्त्री और पुरुष को आगे आने की जरूरत है, जरूरत पड़े तो कठोर बनने में कोई बुराई नहीं है और सब चाहें तो ऐसा होना नामुमकिन नहीं है। यहाँ गौर करने वाली बात है कि असम से लेकर उत्तर प्रदेश, बिहार से लेकर जम्म...

मैं का होना इतना खराब नहीं.इतना बुरा नहीं खुद से प्रेम होना

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कोई भला अपने लिए क्यों लिखता है? क्या अपने लिए लिखना अहंकार है या उस स्पेस की तलाश, जो आपको जिंदगी नहीं देती...वो लोग नहीं देते...वो समाज नहीं देता...वो रिश्ते नहीं देते...जो आपकी जरूरत है। इस दुनिया में प्यार की कमी नहीं है बस वह मिलता तब है जब आप पानी की तरह ढल जाते हैं...बगैर अपनी इच्छाओं, सपनों और व्यक्तित्व का खयाल किये..। बहुत आदर भी मिलता है जब आप दूसरों के सम्मान और तथाकथित इज्जत और आँकाक्षाओं के लिए अपने सम्मान और इच्छाओं की बलि दें...और पूरा जीवन इस महिमामंडन के साथ गुजार दें...जबकि आपके भीतर त्याग कुंठा बन चुका होता है....और इस पर भी कहा जाता है कि प्रेम, रिश्ते, परिवार, समाज सब नि:स्वार्थ हैं...गलत है...नि:स्वार्थ दुनिया में कुछ नहीं होता...जब आप करेंगे तब आपको मिलता है कुछ और वह भी सशर्त...आपकी मुश्किलों में आप अकेले होते हैं...। परिवार भी प्रेम के आधार पर नहीं समाज की शर्तों के अनुसार चलते हैं और वहाँ संतानों के मोह पर भी समाज और उससे मिलने वाली तथाकथित इज्जत भारी पड़ती है। यकीन न हो तो आँकड़े उठाकर देख लीजिए...क्रूरता की तमाम हदें परिवार ही पार करते हैं...हमारे कोलक...

सुबासिनी देवी : सब्जी बेची, बेटे को डॉक्टर बनाया और खड़े किये दो अस्पताल

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सुषमा त्रिपाठी कहते हैं कि मुश्किलें इंसान को तोड़ देती हैं और हालात के सामने हर कोई घुटने टेक देता है मगर कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके सामने मुश्किलें और हालात दोनों हार मान जाते हैं। अपने संकल्प और जिद के दम पर वे ऐसा कुछ कर डालते हैं जो कि एक साधारण इंसान के लिए अकल्पनीय होता है...वह खुद ईश्‍वर का प्रतिबिम्ब बन जाते हैं। कोलकाता के ठाकुरपुकुर बाजार से होती हुए संकरी गलियाँ एक ऐसी जगह जाकर खत्म होती हैं जहाँ आप दृढ़ इच्छाशक्ति का चमत्कार देख सकते हैं। यहाँ आपको जो दिखेगा, वह सिर्फ महिला सशक्तीकरण तक सीमित नहीं है... वह उससे कहीं आगे है...वह मानव सशक्तीकरण है और ऐसा करने वाली एक महिला है। एक ऐसी महिला जिन्होंने चार किताबें भले ही न पढ़ीं हों मगर वो सशक्तीकरण ही नहीं बल्कि प्रेम का सही अर्थ समझा जाती हैं। ये 1971 की बात है जब इस महिला ने अपनी आँखों के सामने अपने पति को दवा और इलाज के अभाव में दम तोड़ते देखा...वह टूटीं और इस व्यथा के बीच उन्होंने एक संकल्प लिया...‘मैंने जो तकलीफ सही...वह कोई और नहीं सहेगा’। इसी संकल्प के साथ उन्होंने तय किया कि वे एक ऐसा अस्पताल बनायेंगी जहाँ कोई इलाज...

अमावस्या के बीच जलती और टूटती रही चाँदनी

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चाँदनी बुझ गयी है। श्रीदेवी नहीं रहीं। 54 साल की उम्र में वह ये मायावी नगरी को छोड़कर चली गयीं। यह खबर सचमुच सदमा देने वाली है। अजीब बात यह है कि खूबसूरती की दास्तान लिखने वाले चेहरों की उम्र कम होती है। हर कोई, हर जगह श्रद्धांजलि देकर रूप की रानी को याद कर रहा है और दिमाग में ख्याल आ रहा है....क्या होगा इस खूबसूरत चेहरे के पीछे....दिल का दौरा....इतनी कम उम्र में।  श्री तलाशतीं रहीं प्यार....प्यार उनको मिला भी...कई सितारों के साथ नाम जुड़ा...जाने कितनी बार टूटी होंगी....कितना मुश्किल रहा होगा बार – बार टूटे दिल को जोड़ना और फिर चेहरे पर चमकीली मुस्कान सजा लेना। खुद अपना और अपने साथ दो बेटियों की लड़ाई लड़ लेना...क्या इस जद्दोजहद ने श्री को छीना.... ? जयललिता....रेखा की तरह श्रीदेवी ने भी बेहद कम उम्र में काम करना शुरू कर दिया...बचपन उन्होंने भी नहीं देखा। जरा सोचिए तो क्या चल रहा होगा उस चार साल की बच्ची के दिमाग में जब उसे गुड़ियों की जगह संवाद रटाये जाते होंगे। कैसा लगता होगा उस बच्ची को जब वह दूसरे बच्चों को ललचायी आँखों से खेलते देखते होगी। नहीं...हम फिल्में दे...

औरतों की लड़ाई तो औरतें ही कमजोर बनाती रही हैं

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जब कॉलेज में थे तो हम स्थानीय जरूरतमंद बच्चों के लिए कॉलेज की ओर से स्कूल चलाया करते थे। बच्चे आते थे और इनमें से कुछ लड़कियाँ भी थीं। आज भी इन बच्चों से मुलाकात होती है और इनमें शामिल हैं...दो बहनें...। इनका एक भाई भी है। आर्थिक अभाव के कारण पिता ने उसे हमारे स्कूल में भेजना शुरू कर दिया था तो हम उसे समझाकर वापस लाये थे। आज वह लड़का अपने पैरों पर खड़ा है। बड़ी बहन पढ़ने में थोड़ी कमजोर थी तो किसी तरह उसने सातवीं पास की और उसकी पढ़ाई छूट गयी। छोटी बेटी अभी पढ़ रही है। हाल ही में इनसे मेरी मुलाकात हुई तो जानकर धक्का लगा कि बड़ी बेटी की शादी तय कर दी गयी है। पिता को उसे पढ़ाना शायद व्यर्थ लग रहा है। वह लड़की कुछ नहीं बोलती या यूँ कहें कि उसके हिस्से का जवाब भी पिता देते या फिर छोटी बेटी से दिलवाते....हैं। मैंने पढ़ाई छूटने का कारण पूछा और यहाँ तक कहा कि इसकी मदद मैं करूँगी मगर कोई फायदा नहीं हुआ। छोटी बेटी ने कहा कि पापा जो कहते हैं, वहीं कह रही है। ये मानसिकता है कि पढ़ने में कमजोर बेटी की पढ़ाई पर खर्च एक बेकार निवेश है। निश्चित रूप से यह पक्षपात ही है मगर कौन समझाए और सबसे बड़...