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रैक नहीं खुल रहा मेरा....

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जरा और जोर लगाओ...बस थोड़ा सा....जोर लगाया गया। हाथ और कमर दोनों, सीधे हो गये...उफ! तुम्हारा रैक न....नहीं खुल रहा। बुआ...मेरी छुटकी बोली...जरा ऊपर बैठो तो...मैं खींचती हूँ। मैंने सोचा कि लड़की कराटे चैम्पियन है...ये तो पक्का खोल लेगी....मगर फिर ख्याल आया  इतनी छोटी है...इससे होगा? फिर भी विराट बनकर उसका उत्साह बढ़ाया -  ठीक है...बाबू...तुम देखो....जोर थोड़ा और लगा......दम लगाके हइशा...नहीं हो रहा है...अच्छा एक बार और ट्राई मारती हूँ.....और जोर से....खुल..खुल जा...ओहो...इतना परेशान कर रखा है...छुटकी और जमकर...बैठकर पैर दूसरे रैक पर रखकर कोशिश करती है....मेरा खाना पच गया...बुआ...रुको...थोड़ा खाकर आती हूँ। उफ....पसीना - पसीना हो गयी है....जाओ...पहले फ्रेश हो....मेरे पास मत बैठो...और तुम न...रुको....देखते हैं....छुरी लेकर आओ...कहीं कुछ अटका हुआ है...छुरी आ गयी....रैक के पास खाली जगह में ऊपर - नीचे...दायें...बायें घुमायी जाने लगी....अच्छा अब जोर लगाओ तो....फिर दम लगाया गया.....नहीं खुल रहा...कैसे बन्द किया था...देखकर बन्द करना था....छुटकी...हँसे जा रही है....बड़की ने आँख...

मन्दारमणि...लहरों की अटखेलियों में खुद को तलाशती दो लड़कियाँ

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मन्दारमणि के समुद्र तट पर हम जल...जीवन है और जल आनन्द भी है....जल सृजन भी है और जल विनाश भी है मगर इन सबसे परे जल जीवन का सौन्दर्य भी है। प्रकृति और इतिहास, दोनों मुझे खींचते हैं और विशाल लहराता समुद्र तो बाँध लेता है। सबसे पहले काम के सिलसिले में ही 2008 -09 के बीच मुम्बई जाना हुआ और वहाँ पर जुहू बीच देखा था। उसके साथ वहाँ फैली गन्दगी भी देखी और शहर को राहत के छींटे देती लहरें भी देखीं मगर तब समुद्र अजनबी था। उसे जानने और देखने की इच्छा बलवती थी...आज वर्षों के बाद दुनिया घूमने और इतिहास को समझने की इच्छा प्रबल हो गयी है तो बस मौका मिलने पर भी भाग जाने का प्रयास करती हूँ। अच्छी बात यह है कि नियति और अवसर, दोनों मुझे अवसर देते हैं और एक अवसर इस बार भी मिला। कार्यालय के साप्ताहिक अवकाश के बीच एक दिन अपने लिए निकालने का और जब एक अपनी सी सहेली मिल जाए तो आनन्द को दोगुना तो होना ही था। वाराणसी से नीलम दो साल बाद जब कोलकाता आयी तो बस उसके सामने प्रस्ताव रखा और वह मान भी गयी..यह उसके लिए अनायास और अत्प्रत्याशित घटना थी, मेरे लिए यह सुखद आश्चर्य से भरा अवसर था। आखिरकार 3 जून को हम...

दुनिया बदलनी है तो पहले माँ, पत्नी, बहन या बेटी नहीं, औरत बनकर सोचिए

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राजस्थान में एक महिला ने अपनी देवरानी को पति के साथ मिलकर पेड़ से बाँधकर बुरी तरह पीटा। महिला का बेटा रोता रहा...उसे दया नहीं आयी। भीड़ ने तमाशा देखा और किसी ने वीडियो भी बना लिया। वीडियो जब वायरल हुआ तो पुलिस ने अभियुक्तों को गिरफ्तार किया....यहाँ खास बात यह है पीड़िता महिला की सगी बहन थी...आप कोसेंगे...कोसिए..जी भरकर कोसते रहिए.....मगर क्या यह ऐसी एकमात्र घटना है? ऐसी घटनायें होती रहती हैं और आप मजा लेते रहते हैं और औरतों की एक दूसरे के बाल खींचती तस्वीरें साझा कर चुटकुले बनाते रहते है और फिर ऐसे ही चलता रहेगा...सोचकर ठंडी आहें भरते हैं। ऐसा नहीं है कि साहित्य जगत इससे अछूता है। एक महाशय स्त्रियों को सेक्स ऑब्जेक्ट घोषित कर देते हैं और तमाम स्त्रियाँ उनके पक्ष में खड़ी हो जाती हैं। यहाँ तक कि महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों को लेकर भी औरतें एक साथ नहीं आतीं। पति के लिए सौतन को मारने वाली या रखने वाली ही औरते ही हैं। कई मामले तो ऐसे भी दिखते हैं जब पति के सथ मिलकर किसी महिला ने किसी दूसरी महिला का बलात्कार करवाया..ऐसे में जाहिर है कि वे औरत नहीं रह जाती हैं बल्कि वे पति, बहन य...

सिर्फ करुणा और ममता की मूरत नहीं है माँ : जमाना अब इमोशनल और टफ मदरहुड का है

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आज है मदर्स डे...विदेशों में तो मदर्स बहुत हद तक मम्मी बन जाती हैं मगर भारत में इसके लिए बहुत से पर्यायवाची शब्द हैं मतलब..अलग - अलग भाषाओं और बोलियों में..माँ...अम्मा...माई...अम्मी ...बेबे....आई और मम्मी...आजकल मॉम भी चलता है। ये अलग बात है कि मॉम कहना आज भी पुराने जमाने की माँओं को कुछ खास पसन्द नहीं है मगर काम तो भावना से है..। अगर भावना की बात की जाए तो भारत में माँ को ममता और करुणा का प्रतिरूप ही माना जाता है मगर इसके अतिरिक्त उसकी कोई और छवि हो सकती है, इसे हम स्वीकार नहीं करते। भारतीय परिवारों में सख्त माओं को अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता। कई बार अगर वह बच्चे को किसी गलती पर डाँटती है तो उसे ताने सुुनने पड़ते हैं मगर अब वक्त बदल रहा है और सख्त माँओं को भी स्वीकार किया जा रहा है। हाल ही में एक विज्ञापन वायरल हुआ था जो एक मॉस्न्यूटो कॉयल का विज्ञापन था और इसे प्रख्यात निर्देशक सुजीत सरकार ने निर्देशित किया था। विज्ञापन में एक सख्त माँ को दिखाया गया जो साथ में खाना खा रहे हैं और एक बच्चा रूठा बैठा है, खाने से इनकार कर रहा है। उसकी माँ की प्रतिक्रिया और सख्ती और उसकी वजह...

पितृसत्ता नहीं, मातृसत्ता ही रही है भारत की शाश्वत परम्परा

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भारत में मातृ सत्ता को हमेशा से महत्व दिया गया है..अगर प्राचीन भारत पर दृष्टि डालें तो देवियों और मातृ शक्ति को दर्शाने वाले कई मंदिर और यत्र - तत्र प्रतिमाओं में बिखरा इतिहास गवाही देता है। एक खास बात यह कि मातायें आज की तरह निरीह, निर्भर और करुणा तक सीमित नहीं होती थीं बल्कि उनकी प्रशासनिक व आर्थिक स्तर पर समाज में भागीदारी होती थी। ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ स्त्रियों ने अपनी संतानों को अकेले बड़ा किया...यहाँ तक कि मध्यकालीन भारत में भी आपको ऐसे उदाहरण मिलते हैं मगर यह सत्य है कि इस मातृसत्तात्मक परम्परा को हाशिए पर डाला गया और धीरे - धीरे स्त्रियों के जीवन पर पितृसत्ता का आधिपत्य हुआ।  यहाँ तक कि प्राचीन भारत में स्वयम्बर अथवा विवाह विच्छेद का अधिकार भी स्त्रियों को प्राप्त था मगर सभी जानते हैं कि आज के युग में स्त्रियों की स्थिति क्या है और एक बार फिर धीरे - धीरे स्त्रियाँ जागरुक हो रही हैं, यह अच्छी बात है और सरकारी स्तर पर सहयोग मिल रहा है। यह अच्छा है मगर अब समय आ गया है कि मातृत्व की छवि और परिभाषा को संतुलित किया जाए। सिर्फ करुणा और निर्भरता के आधार पर स्वस्थ...

समाज की जरूरत हैं प्रसाद की मुखर स्त्रियाँ और उनके प्रश्न

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सुषमा कनुप्रिया जयशंकर प्रसाद हिन्दी साहित्य की निधि हैं और उनका साहित्य समाज की धरोहर। छायावाद का उत्कर्ष उनकी रचनाओं में दिखता है और 'कामायनी' इस उत्कृष्टता का शिखर। राष्ट्रवाद का उत्कर्ष देखना हो तो प्रसाद के समूचे साहित्य में वह भरा पड़ा है। प्रसाद इतिहास के शिलालेख पर संवेदना से समाज को समेटते हुए लिखते हैं मगर मुझे लगता है कि स्त्री के सन्दर्भ में कामायनी उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति नहीं है अपितु इसका शिखर तो 'ध्रुवस्वामिनी' में दिखता है जो पहले प्रकाशित हुई थी। यह आश्चर्य की बात लगती है कि एक ही व्यक्ति के दो रूप उसके साहित्य की दो अलग विधाओं में दिखते हैं। अगर कामायनी की बात की जाए तो वे नारी को श्रद्धा कहते हैं, प्रकृति का रूप बताते हैं मगर पुरुष के प्रतिकार का सामर्थ्य वे उसे नहीं देते हैं जबकि मनु गर्भवती श्रद्धा को छोड़कर चल देता है। वह इड़ा के प्रश्रय में रहता है और उसके साथ उसकी प्रजा पर भी अत्याचार करता है, इसके बावजूद इड़ा को बुद्धि और पश्चिम की बताकर प्रसाद उसे उपेक्षित करते हैं....यह बात बड़ी अजीब लगती है कि तमाम प्रताड़नाओं के बावजूद श्रद्धा मनु को...

हर वहशी अपराध का अंत तो हमारे हाथों से ही होना है

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हर बार कोई निर्भया या आसिफा शिकार होती है, हर बार मोमबत्तियाँ गलायी जाती हैं और हर बार रैलियाँ निकाली जाती हैं। ये कोई नयी बात नहीं है। अपराधियों की सजा की माँग पर सोशल स्टेटस शेयर किये जाते हैं और नेता इस पर अपनी गोटियाँ फिक्स करते हैं। इस पर तब कहाँ थे, टाइप लोग और भी वीभत्स तस्वीरें लाते हैं और पुरानी गलतियों से सीखने की जगह नयी गलती और अपराध को ढकने की कोशिश करते हैं। अच्छा, जरा सोचिए तो ये बलात्कारी पैदा कहाँ से होते हैं? बलात्कार के नाम पर बेटिय़ों को मारने वाले स्टेटस जो चिपका रहे हैं, वह उसी पुरानी हताशा को सामने ला रहे हैं, मारना है तो अपराध को मारिए क्योंकि अपराधी तो रक्तबीज की तरह हैं, एक को मारियेगा...10 और पैदा होंगे। अपराधी को सजा जरूर दीजिए मगर उससे भी जरूरी है कि अपराध को ही जड़ से खत्म किया जाये और इसके लिए फाँसी के अलावा बहुत कुछ करने की जरूरत है। इसके लिए हर स्त्री और पुरुष को आगे आने की जरूरत है, जरूरत पड़े तो कठोर बनने में कोई बुराई नहीं है और सब चाहें तो ऐसा होना नामुमकिन नहीं है। यहाँ गौर करने वाली बात है कि असम से लेकर उत्तर प्रदेश, बिहार से लेकर जम्म...